बलिया। जल निगम में एक के बाद एक योजना में गड़बड़ी सामने आ रही है। सीवर योजना के बाद अब सर्फेस वाटर योजना में भी धांधली प्रकाश में आई है। सर्फेस वाटर योजना के सर्वे के नाम पर करीब 19.20 लाख का भुगतान पिछले माह किया गया, जबकि दो साल पहले यह काम शुरू हो चुका है। और इस सर्वे के बाबत विभाग से कोई आदेश नहीं है। मुख्य अभियंता का भी कहना है कि सर्वे के लिए हुए भुगतान की जांच कराई जाएगी।
जिले में वर्ष 2015-16 में सर्फेस वाटर योजना को लागू किया गया। विभाग की ओर से सर्वे आदि का काम पूरा करने के बाद कुल करीब 800 करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार कर शासन को भेजा गया। इसके तहत नदी से पानी लेकर उसे फिल्टर के माध्यम से शुद्ध करके पानी टंकी के जरिये घरों में आपूर्ति करने की थी। खासकर गंगा व घाघरा के किनारे आर्सेनिक प्रभावित गांवों को इसी परियोजना से पानी की सप्लाई करने की व्यवस्था थी। शासन की ओर से हरी झंडी मिलने के बाद विभिन्न ब्लॉकों में काम भी हुआ। लेकिन दो साल बाद बाद अचानक अगस्त 2018 में सर्वे के नाम पर एक एजेंसी व उसके डाइरेक्टर को 19 लाख 20 हजार 190 रुपये का भुगतान किया गया है। सूत्रों की मानें तो इस सर्वे के बाबत तत्कालीन अधिशासी अभियंता की ओर से न तो कोई आदेश जारी किया गया है और न ही काम शुरू होने के बाद उक्त काम के लिए दूसरी बार सर्वे का अधिकारी के पास अधिकार नहीं है। विभागीय दस्तावेजों के अनुसार एक ओर से जहां सरफेस वाटर का काम चल रहा है वहीं अगस्त महीने में मेसर्स टेक्नो विजडम कंसलटेंट प्राइवेट लिमिटेड को सर्वे के लिए 13 लाख 62 हजार 436 रुपये व इस एजेंसी के डाइरेक्टर महेंद्र सहाय के नाम से पांच लाख 57 हजार 754 रुपये का भुगतान अधिशासी अभियंता कायम हुसेन की ओर से 27 अगस्त 2018 को किया गया है।
हालांकि इस बाबत अधिशासी अभियंता कायम हुसैन ने बताया कि कुछ लोग बार-बार शिकायत करने पर आमादा हैं और इस तरह का आरोप बेबुनियाद है। यह भी कहा कि जो काम करता है उस पर आरोप भी लगते हैं।
वर्जन =
सर्फेस वाटर कार्ययोजना में सर्वे के नाम पर किए गए 19.20 लाख के भुगतान की जानकारी उन्हें नहीं है। इस तरह के भुगतान का विभाग में कोई प्रावधान नहीं है। शिकायत प्राप्त होते ही जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
- बीपी मिश्रा, मुख्य अभियंता, जल निगम वाराणसी परिक्षेत्र
परियोजना शुरू होने से पहले ही होता है सर्वे
बलिया। सरफेस वाटर परियोजना जिले में वर्ष 2015-16 से ही संचालित है। नियमानुसार किसी भी परियोजना की लागत निर्धारित करने के लिए विभाग की ओर सर्वे कराया जाता है। वर्ष 2015-16 में जल निगम ने विभागीय कर्मियों के माध्यम से सर्वे कराने के बाद 800 करोड़ की परियोजना बनाकर शासन को भेजी और शासन से धन स्वीकृत होने के बाद परियोजना का शुुुभारंभ किया गया। सवाल उठता है कि जब किसी एजेंसी से दो साल पहले सर्वे कराया गया तो उसका भुगतान अब क्यों किया गया? अगर सर्वे इस समय कराया गया तो परियोजना के संचालन होने के बाद इसकी क्यों जरुरत पड़ी? जब सर्वे विभागीय कराने का प्रावधान है तो एक निजी संस्था से सर्वे किस आधार पर कराया गया और भुगतान किया गया?
इनसेट...
60 फीसदी हो चुका है कार्य
बलिया। सरफेस वाटर परियोजना को गंगा व घाघरा के किनारे के गांवों को आर्सेनिक मुक्त पेयजल उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया गया। इसके तहत सोहांव, मुरलीछपरा, बेलहरी, बैरिया ब्लॉक के गांवों को नदी के पानी को शुद्ध कर पाइप लाइन से आपूर्ति करने का प्रावधान है। जल निगम के एक्सईन की मानें तो अब तक 60 फीसदी कार्य हो चुका है और कार्य प्रगति पर है।