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तीन माह में थैलीसीमिया पीड़ित 22 बच्चों को 45 यूनिट ब्लड देकर बचायी जान

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बहराइच। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में तीन माह में 45 यूनिट रक्त देकर 22 थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों की जान बचाई गई है। लॉकडाउन में मासूम बच्चों को रक्त देकर उन्हें जीवन देने में मदद अस्पताल प्रशासन द्वारा की गई। वहीं बीते एक वर्ष में ब्लड बैंक पहुंचकर जिले के 7150 लोगों ने रक्तदान किया। इनमें चार एचआईवी पीड़ित मिले। 72 एचबीएसजी के पॉजिटिव लोगों ने भी रक्तदान किया। रक्तदान करने वालों में 18 लोग काली पीलिया के भी मिले। जिससे 96 यूनिट रक्त खराब हो गई।
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मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में जिले भर के स्वस्थ लोग स्वेच्छा से रक्तदान करने आते हैं। लेकिन रक्त देकर मासूमों और लोगों की जान बचाना सबसे बड़ा कार्य है। 22 मार्च से लागू किए गए लॉकडाउन में 22 बच्चे थैलीसीमिया रोग से ग्रसित मिले। ऐसे में इन मासूमों को खून की सख्त जरूरत थी। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. संदीप सिंह ने बताया कि मेडिकल कॉलेज लखनऊ में इलाज करवा रहे इन बच्चों को रक्त की जरूरत हुई। लॉकडाउन के कारण लोग वहां जा नहीं पा रहे थे।
ऐसे में लॉकडाउन के समय ही इन बच्चों का जीवन बचाने के लिए जिला मुख्यालय स्थित ब्लड बैंक से 45 यूनिट रक्त इलाज के लिए परिजनों को दिया गया। जिससे इन बच्चों की जिंदगी बच सकी। थैलीसीमिया से ग्रसित इन सभी बच्चों का इलाज लखनऊ मेडिकल कॉलेज से चल रहा है। ब्लड बैंक प्रभारी ने बताया कि एक मार्च 2019 से 31 मार्च 2020 तक जिले के 7150 लोगों ने ब्लड बैंक आकर स्वेच्छा से रक्तदान किया। इनमें एचबीएसएजी पॉजिटिव 72 लोग मिले। इलाज के लिए सभी को सूचित किया गया।
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डॉ. संदीप ने बताया कि हेपेटाइटिस सी यानी काला पीलिया के 18 लोग मिले। इसके अलावा चार लोग एचआईवी संक्रमित मिले। इसका खुलासा होने पर रक्तदान करने वाले लोगों से संपर्क कर उन्हें उचित सलाह व इलाज की जानकारी दी गई।
लॉकडाउन के कारण जिले से ही हुआ इलाज
जिले के थैलीसीमिया पीड़ित 22 बच्चों का इलाज लखनऊ के पीजीआई और किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। लेकिन लॉकडाउन के चलते वह लखनऊ नहीं जा सके। ऐसे में इनके परिवारीजन उन्हें जिला मुख्यालय लेकर आए। यहां पर इन बच्चों को ब्लड चढ़ाया गया। जिससे जीवन बचाने में सफलता मिली।
जन्मजात बीमारी है थैलीसीमिया
मेडिकल कॉलेज ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. संदीप सिंह ने बताया कि थैलीसीमिया बीमारी जन्मजात है। यह बच्चों में मेजर व माइनर दो तरह से होती है। इस बीमार से पीड़ित बच्चे को हफ्ते या दो हफ्ते में ब्लड की जरूरत होती है। वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके वर्मा ने बताया कि थैलीसीमिया पीड़ित बच्चे की हिमोग्लोबिन बेहतर नहीं रहता है। इससे बच्चों की सांस फूलने, थकान होने, इंफेक्शन होने का खतरा अधिक रहता है। इस बीमारी में ब्लड ट्रांसफ्यूजन बेहद जरूरी है।
96 यूनिट रक्त किया गया नष्ट
मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. डीके सिंह ने बताया कि ब्लड बैंक में चार एचआईवी पाजिटिव, 18 काला पीलिया और 72 एसबएसएजी के लोगों ने रक्तदान किया। जांच में इसका खुलासा होने पर 96 यूनिट रक्त को नष्ट करा दिया गया। क्योंकि यह रक्त इलाज में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।
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