मिहींपुरवा क्षेत्र में गन्ने के खेत बन रहे वन्यजीवों की पनाहगाह। -संवाद
मिहींपुरवा। तराई की हरियाली अब सुकून नहीं, सिहरन बन गई है। खेती बदली तो खतरा भी बढ़ गया। कतर्नियाघाट जंगल से सटे गांवों में गन्ने के ऊंचे और सघन खेत अस्थायी जंगल का रूप ले चुके हैं। दिन में बाघ-तेंदुए इन्हीं खेतों में दुबके रहते हैं और अंधेरा होते ही आबादी की ओर बढ़ जाते हैं। उधर हाथियों के झुंड खेतों को रौंदते हुए गांवों तक पहुंच रहे हैं।
दशकों पहले यह इलाका हल्दी और मिर्च की खेती के लिए प्रसिद्ध था। ग्रामीण बताते हैं कि हल्दी जैसी कम ऊंचाई की फसलें जंगली जानवरों को छिपने का मौका नहीं देती थीं। मिर्च की तीखी गंध से हाथी खेतों के पास आने से कतराते थे। इससे जंगल और गांव के बीच एक प्राकृतिक दूरी बनी रहती थी।
समय के साथ नकदी फसलों गन्ना, परवल और कुंदरू का रकबा बढ़ा और हालात बदल गए। महीनों तक खड़ी रहने वाली ऊंची गन्ने की फसल, परवल और कुंदरू के झाड़ तेंदुओं के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गए। कई बार वन्यजीवों की मौजूदगी का पता तब चलता है, जब हमला हो चुका होता है। गन्ना मीठा होने के कारण हाथियों का भी प्रिय भोजन है। कई बार ग्रामीणों पर भी हमला हो चुका है।
ग्रामीणों का कहना है कि पड़ोसी नेपाल क्षेत्र में हाथियों की नापसंद फसलों की खेती बढ़ने से उनकी आवाजाही भारतीय गांवों की ओर ज्यादा हो गई है। धरमापुर के वृद्ध किसान सुंदर लाल कहते हैं, पहले जंगली जानवरों की आहट दूर से मिल जाती थी, अब गन्ने के घने खेत खतरे को छिपा लेते हैं।
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समाधान की तलाश
हाथी विशेषज्ञ अभिषेक का कहना है कि जब खेती का ढांचा जंगल जैसा हो जाता है तो इंसान और वन्यजीव के बीच की दूरी सिमट जाती है। स्थानीय लोग पारंपरिक फसलों हल्दी, मिर्च, नींबू और सरसों की ओर लौटने की बात कर रहे हैं, ताकि जंगल और आबादी के बीच फिर से एक प्राकृतिक बफर जोन बन सके।