बहराइच। उपन्यास और कहानियों से आम आदमी के दिल में जगह बनाने वाले मुंशी प्रेमचंद बहराइच में भी रहे हैं। उन्होंने जिले के राजकीय इंटर कॉलेज में तीन माह तक शिक्षण कार्य किया। लेकिन 113 साल के सफर में मुंशी प्रेमचंद की एक भी पहचान बहराइच राजकीय इंटर कॉलेज सहेज नहीं सका। मुंशी प्रेमचंद्र के हस्ताक्षर भी कॉलेज में सुरक्षित नहीं हैं। इसके बावजूद कॉलेज के शिक्षक अपने आपको गौरवान्वित जरूर महसूस करते हैं। अब सिर्फ बहराइच के लोगों के मन मस्तिष्क में मुंशी प्रेमचंद की किताब में पढ़ी जीवनी की स्मृतियां ही शेष हैं।
पूस की रात, कलम का सिपाही, ईदगाह कहानियां और गबन, गोदान जैसे उपन्यास प्रेमचंद को जहां आम जनमानस से जोड़ते हैं, वहीं सामाजिक विसंगति व परंपराओं का अहसास कराते हैं। इन रचनाओं के रचनाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपने जीवन यात्रा की शुरुआत शिक्षक के रूप में की थी।
हिंदी साहित्य के इतिहास व प्रेमचंद की जीवनी पर नजर डालें तो 31 जुलाई 1880 को जन्मे मुंशी प्रेमचंद ने वर्ष 1900 में 20 वर्ष की आयु में शिक्षण कार्य से जीवन की शुरुआत की। चिनार में 18 रुपये प्रति माह पर एक निजी विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर तैनात हुए। हालांकि यहां से छह माह बाद उनका चयन तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट स्कूल बहराइच वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज में हो गया।
बहराइच में पांचवें शिक्षक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को तैनाती मिली थी। लेकिन यहां पर सिर्फ तीन महीने ही मुंशी प्रेचमंद ने शिक्षण कार्य किया। इसके बाद उनका तबादला डिस्ट्रिक्ट स्कूल प्रतापगढ़ में हेडमास्टर के पद पर हो गया। लेकिन इन तीन महीनों में बहराइच की सरजमी पर ही मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की ओर अपने जीवन की दिशा को मोड़ा था।
सूत्रों से पता चलता है कि उपन्यास अजर ए मुआविद की रूपरेखा बहराइच में शिक्षण कार्य के दौरान ही मुंशी प्रेमचंद ने बनाई थी। हालांकि प्रतापगढ़ में इस उपन्यास का उपसंहार लिखा। मुंशी प्रेमचंद बहराइच में बतौर शिक्षक तैनात जरूर रहे, लेकिन उनकी निशानी कुछ भी शेष नहीं है। राजकीय इंटर कॉलेज में वह उपस्थिति पंजिका भी दीमक चट कर गए, जिसमें मुंशी प्रेमचंद हस्ताक्षर करते थे। पता चला है कि रखरखाव की स्थिति ठीक न होने के चलते कागजात सड़ गल गए या दीमक चट कर गए।
बहुत खोजा लेकिन नहीं मिला कैटलॉग और रजिस्टर
राजकीय इंटर कॉलेज के वर्तमान प्राचार्य सुभाष पांडेय से जब इस मामले में बात की गई तो उन्होंने कहा कि काम्लेज से मुंशी प्रेमचंद्र के जुड़ाव की जानकारी थी। इसके चलते विद्यालय का चार्ज संभालते ही खोजबीन करवायी। लेकिन न तो कैटलॉग मिला न ही रजिस्टर। प्राचार्य ने कहा कि मंशी प्रेमचंद्र से जुड़ा एक तिनका भी हमारे लिए धरोहर है। काफी समय हो गया है। फिर भी खोज जारी है।
गौरवान्वित हैं राजकीय इंटर कॉलेज के शिक्षक
राजकीय इंटर कॉलेज के प्राचार्य सुभाष चंद्र पांडेय मूलत: जिले के पयागपुर के निवासी हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता और बाबा बताया करते थे कि मुंशी प्रेमचंद ने बहराइच में राजकीय इंटर कॉलेज में अध्यापन किया है। सौभाग्य से उन्हें भी विद्यालय की जिम्मेदारी मिली है। इसलिए वह अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। पूर्व अंग्रेजी प्रवक्ता वीएस श्रीवास्तव ने कहा कि उन्होंने कई बार मुंशी प्रेमचंद के हस्तलिखित या हस्ताक्षरित अभिलेखों को खोजने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। पूर्व प्रवक्ता रामउदार शुक्ला ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद के जीआईसी में शिक्षण कार्य से जीआईसी के साथ ही बहराइच गौरवान्वित है। शिक्षक ओमप्रकाश त्रिपाठी का भी कहना है कि मुंशी प्रेमचंद की कर्मस्थली जीआईसी बहराइच होने के चलते वह सभी गौरवान्वित हैं।
पुराना महाराज सिंह तब था डिस्ट्रिक्ट स्कूल
पयागपुर के सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षक जगत नारायण अवस्थी से जब मुंशी प्रेमचंद के बारे में बात की गई तो बोले कि वर्ष 1900 में डिस्ट्रिक्ट स्कूल वहां था, जहां इस समय पुराना महाराज सिंह कॉलेज का भवन है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद स्कूल भवन स्थानांतरित हुआ था। इसके बाद राजकीय इंटर कॉलेज का संचालन छावनी क्षेत्र में होने लगा। उन्होंने कहा कि एक कैटलॉग मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित मिलने की बात ट्रेनिंग के दौरान सुनी थी लेकिन उसका क्या हाल है, पता नहीं है।
इंसेट
शिक्षा महकमे के साथ गौरवान्वित है जिला
राजकीय इंटर कॉलेज में मुंशी प्रेमचंद्र के अध्यापन से शिक्षा महकमे के साथ पूरा जिला गौरवान्वित है। मुंशी प्रेमचंद्र के जिले में सेवाकाल को लगभग 100 साल व्यतीत हो चुके हैं। फिर भी मुंशी प्रेमचंद्र की स्मृतियों को सहेजने की कोशिश जारी है। गजेटियर के माध्यम से जिले में मुंशी प्रेमचंद्र के शैक्षिक योगदान को सहेजने की कोशिश हो रही है।
- राजेंद्र कुमार पांडेय, जिला विद्यालय निरीक्षक