बहराइच। गांव की बुजुर्ग महिलाएं अभी भी पुरानी सोच से बंधी हैं। यही कारण है कि जिले में आधी से अधिक गर्भवती महिलाएं पहली तिमाही में पंजीकरण नहीं कराती हैं। ई-कवच पोर्टल के अनुसार अप्रैल से सितंबर तक 60539 गर्भवती की पहली जांच हुई, जिनमें केवल 23509 ने ही समय पर पंजीकरण कराया।
एसीएमओ डॉ. संतोष राना का कहना है कि गर्भावस्था का जल्दी पंजीकरण कराने से एनीमिया, ब्लड प्रेशर और शुगर जैसी जटिलताओं का समय रहते पता चल जाता है। इससे गर्भवती महिलाओं को पीएम सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत विशेषज्ञ तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि पति और परिवार के बड़े सदस्य, जैसे सास या जेठानी भी गर्भवती के शीघ्र पंजीकरण में सहयोग करें। गर्भवती महिलाओं के पंजीकरण के लिए सभी आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया है ताकि वे उन मिथकों के प्रति संवाद बढ़ा सकें, जो गर्भवती के पंजीकरण में बाधा डालते हैं। इसके परिणाम अब धीरे-धीरे दिखाई भी देने लगे हैं।
सीएमओ डॉ. संजय शर्मा का कहना है कि गांवों के नजदीक आयुष्मान आरोग्य मंदिर खुलने से अब गर्भावस्था निर्धारण की जांच निःशुल्क और सुलभ हो गई है, यह जांच किट आशा कार्यकर्ताओं को भी दी गई है। अब सबसे बड़ी चुनौती सुविधा नहीं बल्कि सोच बदलना है। जल्दी पंजीकरण मां और बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
ये सोच है पंजीकरण में बाधा
फखरपुर ब्लॉक के माधवपुर गांव की मुन्नी देवी कहती हैं कि शुरुआत के तीन माह में पंजीकरण कराना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि बाद में गर्भपात की स्थिति हो जाने से गांव में मुंह छिपाना होता है। इसी प्रकार गुड्डी का कहना है कि अनचाहा गर्भ ठहरने से उसका पंजीकरण कराने से पहले उससे छुटकारा पाने का प्रयास किया जाता है। ऐसे में पंजीकरण कराना समझ में नहीं आता है।
क्या कहती हैं आशा कार्यकर्ता
आशा कार्यकर्ता किरन का कहना है कि गांव की बुजुर्ग महिलाएं पंजीकरण में बाधा डालती हैं। अब जब उन्हें यह समझाया गया कि उन्हें सरकार की मातृत्व योजना का लाभ मिलेगा तो वह पंजीकरण के लिए हामी भर रही हैं। शीघ्र ही पंजीकरण के प्रति गर्भवती महिलाओं का रुझान बढ़ेगा।