कतर्नियाघाट संरक्षित वनक्षेत्र में तेंदुए को छोड़ने जाती टीम। - स्रोत : विभाग
बहराइच/बिछिया। कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के ट्रांस गेरुआ इलाके में शनिवार को पहली बार किसी तेंदुए को रेडियो कॉलर पहनाकर जंगल में छोड़ा गया, लेकिन अब तक रेडियो कॉलर सक्रिय नहीं हो सका है। वन विभाग डिवाइस के एक्टीवेट होने के इंतजार में है। इसके सक्रिय होने के बाद ही तेंदुए की दिनचर्या और मूवमेंट की सटीक जानकारी मिल सकेगी।
दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन अंतर्गत धौरहरा रेंज के हौकना बीट स्थित ग्राम चंदैयापुर में 20 फरवरी को एक मादा तेंदुआ पिंजरे में कैद हुई थी। स्वास्थ्य परीक्षण के बाद अधिकारियों ने उसे प्राकृतिक आवास में छोड़ने की अनुमति प्रदान की।
तेंदुए की गतिविधियों का अध्ययन करने के उद्देश्य से उसे रेडियो कॉलर टैग लगाकर कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के ट्रांस-गेरुआ क्षेत्र में छोड़ा गया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी दबीर हसन ने बताया कि मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन के तहत तेंदुए को कॉलर करने का यह उत्तर प्रदेश में पहला मामला है।
बताया कि इससे सैटेलाइट के माध्यम से तेंदुए की गतिविधियों की सतत निगरानी की जा सकेगी। एकत्रित आंकड़ों का विश्लेषण कर मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए प्रभावी रणनीति तैयार की जाएगी। डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया कि डिवाइस सक्रिय होते ही उसके मूवमेंट की निगरानी की जा सकेगी।
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सक्रिय होने में लगेगा 24 से 36 घंटे का समय
वरिष्ठ परियोजना अधिकारी दबीर हसन ने बताया कि रेडियो कॉलर टैग डिवाइस डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की ओर से वन विभाग को उपलब्ध कराया गया है। कॉलर डिवाइस के सक्रिय होने में 24 से 36 घंटे का समय लग सकता है। इसके लिए डिवाइस बनाने वाली कंपनी वेक्ट्रॉनिक्स के अधिकारियों से लगातार संपर्क किया जा रहा है। डिवाइस से संबंधित अपडेट डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ ही डीएफओ के कंप्यूटर और मोबाइल पर भी प्राप्त होगी।
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मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की रणनीति बनाने में मिलेगी मदद
वरिष्ठ परियोजना अधिकारी ने बताया कि रेडियो कॉलर से तेंदुए की दिनचर्या की जानकारी तो मिलेगी ही, साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए ठोस रणनीति बनाने में भी सहायता मिलेगी।