बहराइच। ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा की कहानी बताती है कि महान खिलाड़ी स्टेडियमों में नहीं, स्कूल और गांव के मैदानों में तैयार होते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब स्कूलों के मैदान ही खत्म हो रहे हों तो अगला नीरज चोपड़ा कहां से निकलेगा। जिले के विद्यालय कभी राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करते थे, लेकिन अब अधिकांश स्कूलों में मैदान सिकुड़ गए हैं या समाप्त हो चुके हैं। नतीजा यह है कि खेल प्रतिभाएं शुरुआत में ही दम तोड़ रही हैं।
जिले में 310 माध्यमिक विद्यालय हैं, जिनमें 28 सहायता प्राप्त, 69 राजकीय और 223 वित्तविहीन विद्यालय शामिल हैं। पड़ताल में सामने आया कि एक दशक पहले जिन स्कूलों से राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकलते थे, वहां आज नियमित अभ्यास के लिए पर्याप्त मैदान तक उपलब्ध नहीं हैं। कई विद्यालयों में पीटी पीरियड बरामदे और प्रार्थना स्थल तक सिमट गया है।
कभी इन स्कूलों ने दिए थे राष्ट्रीय खिलाड़ी
शहर के महाराज सिंह इंटर कॉलेज के छात्र संजीव सिंह ने 4 नवंबर 2023 को यूपी स्कूल गेम्स की 100 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद 15 जुलाई 2024 को लखनऊ में आयोजित यूपी स्टेट जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में फेडरेशन कप में भी प्रतिभाग किया। यह साबित करता है कि अवसर मिलने पर जिले की प्रतिभाएं आज भी आगे बढ़ सकती हैं।
निशानेबाजी में आलोक को मिला था गोल्ड
राजकीय इंटर कॉलेज के पूर्व छात्र आलोक कुमार श्रीवास्तव ने निशानेबाजी में जिले का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया। उन्होंने 1993-94 में कोयंबटूर में आयोजित अखिल भारतीय जीवी मावलंकर निशानेबाजी प्रतियोगिता और राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में रजत पदक जीता। 1994-95 में अहमदाबाद में एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर नया कीर्तिमान बनाया। इसके बाद कानपुर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण, कोयंबटूर में रजत और मुंबई मास्टर्स प्रतियोगिता में कांस्य पदक भी हासिल किया।
गणित बता रहा बड़ा नुकसान
यदि जिले के 310 माध्यमिक विद्यालयों में से प्रत्येक स्कूल हर वर्ष केवल दो उत्कृष्ट खिलाड़ी तैयार करे, तो 620 प्रतिभाशाली खिलाड़ी सामने आ सकते हैं। इनमें से यदि सिर्फ 10 प्रतिशत भी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचें तो हर वर्ष लगभग 60 खिलाड़ी जिले और प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। लेकिन मैदान और प्रशिक्षकों की कमी इस संभावना को शुरुआत में ही खत्म कर रही है।
विशेषज्ञों की राय
सेवानिवृत्त खेल शिक्षक सरदार सरजीत सिंह कहते हैं कि हरियाणा, पंजाब और ओडिशा में स्कूलों के मैदान और नियमित प्रशिक्षण ने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं। मैदान खत्म होंगे तो खिलाड़ी भी खत्म हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी किताब पढ़कर नहीं बनता। उसे मैदान, कोच और रोज अभ्यास चाहिए। मैदान नहीं होगा तो प्रतिभा कभी निखरेगी ही नहीं। पूर्व एथलीट रामूलाल का कहना है कि आज बच्चे मोबाइल पर खेल देख रहे हैं, लेकिन खेलने की जगह नहीं है। यही सबसे बड़ी विडंबना है।
वर्तमान में ये हैं हालात
कई विद्यालयों में खेल मैदान नहीं या उपयोग योग्य नहीं।
पीटी पीरियड व्यायाम और योग तक सीमित।
नियमित अभ्यास के अभाव में प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन प्रभावित।
खेल शिक्षक और संसाधनों की कमी से प्रतिभाओं का विकास बाधित।