मिहींपुरवा। कतर्नियाघाट जंगल में शाकाहारी वन्यजीवों की गणना 15 दिसंबर से शुरू होगी। इसके लिए सभी वन रेंजों में वनकर्मियों को प्रशिक्षण देकर ट्रांसेक्ट मार्गों (निर्धारित रास्ता) पर तैनात कर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार यह गणना बाघ संरक्षण की आधारभूत प्रक्रिया है, क्योंकि शिकार और शिकारी का संतुलन इन्हीं आंकड़ों से समझा जाता है।
वन्यजीव प्रभाग की सात वन रेंजों में 15 से 17 दिसंबर तक मांसाहारी वन्यजीवों की और 18 से 20 दिसंबर तक शाकाहारी वन्यजीवों की गणना की जाएगी। इस दौरान वन कर्मियों को प्रत्येक बीट में पैदल चलकर मोबाइल एप के माध्यम से चीतल, सांभर, बारहसिंगा सहित अन्य प्रजातियों की संख्या, उम्र, लिंग और दूरी से संबंधित जानकारी दर्ज करनी होगी। इसके साथ ही शाकाहारी जीवों के भोजन के लिए उपलब्ध वनस्पति का डेटा भी भरा जाएगा।
पहले चरण में कतर्नियाघाट, निशानघाटा, सुजौली और धर्मापुर रेंजों के कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है, जबकि दूसरे चरण में ककरहा, मोतीपुर, चकिया, रुपईडीहा, अब्दुल्लागंज और नानपारा रेंज के कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। सुजौली के वन क्षेत्राधिकारी रोहित कुमार ने यह प्रशिक्षण संपन्न कराया।
हर प्रजाति का विवरण मोबाइल एप में भरना जरूरी
गणना के पहले दिन वन कर्मियों की टीमें सुबह-सुबह निर्धारित ट्रांसेक्ट मार्गों पर दूरी सैंपलिंग पद्धति के तहत शाकाहारी प्रजातियों के समूहों का निरीक्षण कर डेटा दर्ज करेंगी। प्रत्येक प्रजाति का विस्तृत विवरण मोबाइल एप में भरना अनिवार्य होगा।
जलस्रोतों पर विशेष निगरानी
गर्मी और सर्दी, दोनों मौसम में महत्वपूर्ण वाटरहोल गणना भी साथ में की जाएगी। प्राकृतिक एवं कृत्रिम जलस्रोतों पर तैनात पर्यवेक्षक यहां आने वाले शाकाहारी समूहों की संख्या और गतिविधि का रिकॉर्ड तैयार करेंगे। विभाग के अनुसार, जलस्रोतों से मिले आंकड़े रात में सक्रिय प्रजातियों का भी संकेत देते हैं।
कैमरा ट्रैप से भी जुटेगा डेटा
यद्यपि कैमरा ट्रैप मुख्यत: बाघ गणना में उपयोग होते हैं, लेकिन इन कैमरा रिकॉर्डिंग से शाकाहारी जीवों की उपस्थिति और गतिविधियां भी पता चलती हैं। इससे घने जंगलों में रहने वाले शर्मीले वन्यजीवों की जानकारी भी मिलती है।
संरक्षण योजनाओं का आधार बनेगा डेटा
प्रभागीय वनाधिकारी सूरज कुमार ने बताया कि यह गणना केवल संख्या ज्ञात करने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की संरक्षण योजनाओं की रीढ़ भी है। जहां भोजन की कमी होगी, वहां बाघ मानव बस्तियों की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे संघर्ष बढ़ता है। गणना के बाद प्राप्त आंकड़ों के आधार पर घास के मैदानों का विकास, जलस्रोतों का संरक्षण और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की जाएगी।