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Bahraich News: कतर्निया से नेपाल यात्रा पर निकले गजराज, जंगल में सन्नाटा

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कतर्नियाघाट संर​क्षित वनक्षेत्र में विचरण करते टस्कर हाथी की फाइल फोटो। :स्रोत विभाग
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मिहींपुरवा (बहराइच)। एक बार फिर हाथी अपनी प्राकृतिक यात्रा पर चल पड़े हैं। कतर्नियाघाट के हरे-भरे जंगलों से हाथियों का बड़ा झुंड खाता काॅरिडोर के रास्ते नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क के लिए निकल चुका है। इस झुंड में करीब 250 से 300 गजराज शामिल हैं। वहीं जंगल में अब सिर्फ दो टस्कर यानि उग्र नर हाथी ही बचे हैं, जिनमें से एक को कतर्नियाघाट और दूसरा निशानगाड़ा व सुजौली रेंज में अकेले घूमते देखा जा रहा है।
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हर साल की तरह इस बार भी बरसात शुरू होते ही हाथियों का झुंड जंगल पार कर नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क की ओर निकल गया है। वन विभाग के अधिकारी और स्थानीय ग्रामीण इसे हाथियों की प्राकृतिक यात्रा मानते हैं, जो मौसम, भोजन और आवासीय जरूरतों से जुड़ी होती है।

कतर्नियाघाट अब टाइगर रिजर्व ही नहीं, हाथी रिजर्व भी है, उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2022-23 में इस वन क्षेत्र को तराई हाथी रिजर्व घोषित किया था। इसका मकसद बढ़ती हाथी आबादी को संरक्षण देना और उनके निर्बाध आवागमन के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाना था। इस फैसले से इंसान और हाथी के बीच होने वाले संघर्ष पर भी काफी हद तक विराम लगा है।
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कतर्नियाघाट के घने जंगलों में कठगूलर, तेंदू, महुआ, बेंत जैसे पेड़-पौधे, ताजी हरी घास और पेड़ों की छाल हाथियों का मुख्य आहार हैं। इसके अलावा पास के गांवों की गन्ने की फसल भी उन्हें खूब भाती है। यही वजह है कि यह क्षेत्र हाथियों के लिए आदर्श निवास स्थल माना जाता है।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार जो हाथी झुंड से अलग हो जाते हैं या जिन्हें झुंड से बाहर कर दिया जाता है, उन्हें टस्कर कहा जाता है। ये अक्सर आक्रामक होते हैं और मानव बस्तियों के आसपास भटकते नजर आते हैं। कभी- कभी यह हाथी हमलावर भी हो जाते हैं और घरों और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।

इनफ्रासाउंड में बोलते हैं हाथी
सुजौली रेंज के वन क्षेत्राधिकारी रोहित कुमार बताते हैं कि हाथी अत्यंत बुद्धिमान और सामाजिक जानवर होता है। झुंड का नेतृत्व मादा हाथी करती है। हाथी इतने संवेदनशील होते हैं कि वे अपने झुंड के अन्य सदस्यों से दूर-दराज होते हुए भी इनफ्रासाउंड यानी बेहद गहरे स्वर से बातचीत कर लेते हैं, जो इंसानों को सुनाई नहीं देती। वन क्षेत्राधिकारी ने बताया कि कतर्नियाघाट और नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क के बीच की दूरी महज 15 किलोमीटर की है, जो हाथियों के लिए पारंपरिक मार्ग बन चुका है। हर साल गर्मी के बाद बरसात में ये हाथी इसी रास्ते नेपाल चले जाते हैं और फिर मानसून के बाद लौट आते हैं।


टूरिज्म को भी मिल रहा है बढ़ावा
हाथी रिजर्व बनने से सिर्फ हाथियों को ही लाभ नहीं हुआ, बल्कि पर्यटकों की संख्या बढ़ने से जंगल सफारी, गाइडिंग, होटल व स्थानीय रोजगार के अवसरों में भी इजाफा हुआ है। जंगल से जुड़े तमाम लोगों को उम्मीद है कि गजराज जल्द लौटेंगे और जंगल फिर से उनकी चिंघाड़ से गूंज उठेगा।
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