बहराइच। हिंदी हिंदुस्तान की है अपनाइये, स्वदेशी चीजें ही लायें और खाइये। हिंदी राष्ट्र भाषा बने, आत्मनिर्भर हों सभी, जिस भाषा के थे गुलाम उसे न गाइये। कवि लक्ष्मीकांत त्रिपाठी मृदुल की यह पंक्तियां हमें हिंदी भाषा के सम्मान की दिशा में अमर उजाला के प्रयास के साथ जुड़ते हुए उसे एक नई ऊंचाइयों तक ले जाने की सार्थक पहल के लिए प्रेरित करती हैं। अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान से लोगों के जुड़ने का सिलसिला जारी है। हिंदी को जन-जन की भाषा की दिशा में अमर उजाला की रूबरू कराती रिपोर्ट।
निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषा कै मूल
आज के दौर में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अधिक हो रहा है। पुलिस की ओर से प्रार्थना पत्र लिए जाने से लेकर मुकदमे दर्ज करने और उनकी विवेचना में भी हिंदी का प्रयोग अधिक से अधिक किया जा रहा है। निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषा कै मूल की सूक्ति के साथ अमर उजाला का हिंदी है हम अभियान एक सराहनीय प्रयास है।
डॉ. विपिन मिश्रा, एसपी, बहराइच
हिंदी की अपनी अलग पहचान
हिंदी एक लोकप्रिय भाषा है। मातृभाषा के साथ ही यह हमें अपने के बीच प्रतिस्थापित करने का मनोबल प्रदान करती है। सरल और सहज भाषा के रूप में हिंदी की अपनी अलग पहचान है।
कवि लक्ष्मीकांत त्रिपाठी मृदुल, राष्ट्रीय अध्यक्ष सनातन साहित्य परिषद, बहराइच
दिल में पनपते प्यार का अहसास है हिंदी
दिल में पनपते प्यार का अहसास है हिंदी के साथ कहना है कि आज के दौर में हिंदी भाषा को छोड़कर युवा पीढ़ी अंग्रेजी को आत्मसात कर रही है। अमर उजाला की ओर से चलाए जा रहे हिंदी हैं हम अभियान से जरूर एक बदलाव देखने को मिलेगा।
कवयित्री रश्मि प्रभाकर
हिंदी को जन-जन तक पहुंचाएं
वर्तमान समय में हिंदी भाषा का सरकारी और निजी कार्यालयों में प्रयोग घटता जा रहा है। मातृभाषा के रूप में पहचान रखने वाली हिंदी को जन-जन तक पहुंचाने की दिशा में अमर उजाला की पहल सराहनीय है। इसे हम सभी को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
कवि देशराज सिंह आजाद