बहराइच/बिछिया। पांच अक्तूबर को पूरे भारत में डॉल्फिनों की गणना शुरू हो गई। इसी के साथ कतर्नियाघाट सेंक्चुरी से होकर बहने वाली नदियों में भी राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन गणना अभियान शुरू हो गया। सोमवार सुबह डीएफओ आशीष तिवारी ने झंडी दिखाकर गणना टीम को रवाना किया।
नेपाल की गेरुआ और कौड़ियाला नदी के साथ ही घाघरा में सीतापुर की सीमा तक डॉल्फिन की उछलकूद को रिकॉर्ड किया जाएगा। पहले दिन गेरुआ और कौड़ियाला नदी में कुल 13 डॉल्फिन टीम को दिखी हैं। चार दिन तक गणना का कार्य करने के बाद रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी, जहां से तराई की नदियों में डॉल्फिन के कुनबे का पता चल सकेगा।
नेपाल के पहाड़ों से निकलने वाली गेरुआ और कौड़ियाला नदी कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के कतर्नियाघाट रेंज से होकर बहती है। इन दोनों नदियों का संगम बहराइच-लखीमपुर की सीमा पर चौधरी चरण सिंह गिरिजापुरी बैराज पर होता है। यहां से घाघरा नदी निकलती है।
गेरुआ, कौड़ियाला और घाघरा नदियों का पानी डॉल्फिन के कुनबे के विकास में सहायक माना जाता है। इसी के चलते डॉल्फिन की संख्या में निरंतर वृद्धि भी हो रही है। वर्ष 2012 के पूर्व इन तीनों नदियों में डॉल्फिन की संख्या 45 के आसपास थी। वर्ष 2012 की गणना में संख्या 60 पहुंच गई थी। अब फिर शासन ने डॉल्फिन की गणना के निर्देश दिए थे। उसी के तहत सोमवार से डॉल्फिन गणना अभियान की शुरुआत की गई।
नेपाल सीमा से सटे कतर्नियाघाट रेंज के कोठियाघाट के डाउन स्ट्रीम में डॉल्फिन गणना टीम की मोटरबोट को डीएफओ आशीष तिवारी ने झंडी दिखाकर रवाना किया। इस टीम में डिप्टी रेंजर एसपी सिंह, वन दरोगा मनोज कुमार, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के डॉल्फिन विशेषज्ञ डॉ. सहनवाज खान, कतर्नियाघाट वेलफेयर सोसाइटी के आबिद रजा, वन विभाग के रामरूप और सोभई शामिल हैं।
यह टीम सीतापुर सीमा तक 80 किलोमीटर परिक्षेत्र में गेरुआ, कौड़ियाला और घाघरा नदी का पानी खंगालकर डॉल्फिन की गिनती करेगी। डीएफओ आशीष तिवारी का कहना है कि डॉल्फिन की संख्या इस बार अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। हो सकता है कि संख्या 80 के पार पहुंच जाए। उन्होंने बताया कि अभियान की शुरुआत पर लोगों को डॉल्फिन के प्रति जागरूक करने के लिए डॉल्फिन डे भी मनाया गया।
सिर्फ गिनती पर होता जोर
डीएफओ आशीष तिवारी व डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वरिष्ठ परियोजनाधिकारी दबीर हसन ने बताया कि गणना में सिर्फ डॉल्फिन की गिनती की जाती है। नर-मादा की गिनती पर जोर नहीं दिया जाता क्योंकि इस सीजन में डॉल्फिन फुल जंप नहीं करती। नर और मादा की पहचान तभी संभव है, जब डॉल्फिन पानी के ऊपर निकले।
120 सेकेंड में आती है बाहर
नदी के अंदर डॉल्फिन अधिक देर नहीं रह पाती है। वह सांस लेने के लिए हर 100 से 120 सेकेंड के अंदर पानी से ऊपर जरूर निकलती है। इसी से डॉल्फिन की गणना संभव है।
ऐसे रखते नजर
डीएफओ ने बताया कि गणना का तरीका यह है कि मोटरबोट को नदी के बीचोबीच संचालित किया जाता है। नदी के दोनों ओर कर्मचारी नजर रखते हैं। लगभग 15 किलोमीटर की रफ्तार से मोटरबोट चलती है। डॉल्फिन के निकलने पर उसकी गिनती की जाती है। इसमें डॉल्फिन के बच्चे भी शामिल होते हैं।
दर्ज होता है जीपीएस लोकेशन
परियोजनाधिकारी दबीर हसन ने बताया कि गणना के दौरान जहां डॉल्फिन दिखती है, वहां का जीपीएस लोकेशन भी आंकड़ों में दर्ज किया जाता है। उन्होंने बताया कि डॉल्फिन की विशेषता है कि वह तेजी से तैरकर आगे नहीं बढ़ती।
यहां दिखीं डॉल्फिन
गणना टीम में शामिल कतर्नियाघाट वेलफेयर सोसाइटी के आबिद रजा ने बताया कि पहले दिन टीम ने कुल 18 किलोमीटर तक के परिक्षेत्र में भ्रमण किया है। उन्होंने कहा कि गेरुआ और कौड़ियाला में कुल 13 डॉल्फिनें दिखी हैं। दोनों नदियों के संगम के लगभग एक किलोमीटर के दायरे में छह और इसके आगे सीतापुर को ओर बढ़ने पर सात और डॉल्फिनें मिलीं। उन्होंने कहा कि डॉल्फिनों की ये संख्या सुखद संकेत है।
राप्ती में अठखेलियां करती मिलीं तीन डॉल्फिन
श्रावस्ती। राप्ती नदी में भी सोमवार को डॉल्फिनों की गणना शुरू हुई। जमुनहा बैराज पर अभियान की शुरुआत करते हुए जिलाधिकारी आर विक्रम सिंह ने प्रशिक्षित टीमों की मोटरबोट को झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि राप्ती नदी में डॉल्फिन का प्रकृतिवास उपयुक्त है। इनकी घटती संख्या चिंता का विषय है, इनके संरक्षण को सभी को आगे आना होगा।
प्रभागीय वनाधिकारी सीडी यादव ने कहा कि डाल्फिन ज्यादातर मीठे जल में ही डेरा जमाती है। यही कारण है कि डाल्फिन गंगा व उसकी सहायक नदियों में ही निवास करती है। यह जलीय जैव विविधता को दूर करने में महत्वपूर्ण कड़ी निभाती है।
प्रभागीय वनाधिकारी ने बताया कि पहले दिन बैराज से किलोमीटर छह व 29 के बीच तीन डाल्फिन दिखी, जो उत्साहवर्धक है। कार्यक्रम को क्षेत्रीय वनाधिकारी संजय सिंह, क्षेत्रीय वनाधिकारी ककरदरी आलोक चंद्र पांडे ने भी संबोधित किया।