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किसानों पर मेहरबान होने को तैयार नहीं बदरा

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बहराइच। मानसून की सुस्ती ने जिले को सूखे के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। बारिश के इंतजार में जिले के किसान आसमान में घुमड़ रहे बादलों की ओर टकटकी लगाए हैं, लेकिन बादल मेहरबान होने को तैयार नहीं दिखते। कृषि विभाग के विशेषज्ञों के मुताबिक, जुलाई माह के दूसरे हफ्ते तक खरीफ की फसलों की जरूरत से 60 फीसदी कम बारिश हुई है, जिससे जिले के किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खिंच गईं हैं। कम बारिश का सीधा असर धान की रोपाई पर पड़ा है। जहां पूर्व के वर्षों में अब तक 90 प्रतिशत खेतों में धान की रोपाई हो जाती थी, वहीं इस बार सिर्फ 30 से 35 प्रतिशत खेतों में ही रोपाई हो सकी है। इसका सीधा असर धान के उत्पादन पर पड़ेगा। फिलहाल, कृषि वैज्ञानिक उत्पादन 25 प्रतिशत कम होने की आशंका जता रहे हैं।
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जिले में 5.29 लाख किसान हैं जिनमें से अधिकांश खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान की रोपाई करते हैं। धान की रोपाई में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन इस बार किसानों के सामने जल संकट उत्पन्न हो गया है। पूर्व के वर्षों की भांति इस बार भी किसान जून व जुलाई माह में झमाझम बारिश की उम्मीद लगाए थे, लेकिन मेघों ने किसानों की इस उम्मीद को तोड़ दिया और इस बार औसत से भी कम बारिश हुई है। जुलाई के पहले सप्ताह तक ही जहां 140 से 150 मिली मीटर बारिश हो जानी चाहिए थी, वहां लगभग आधी जुलाई बीतने को है और अब तक मात्र 60 मिली मीटर ही बारिश हुई है। अगर बात पूरे जुलाई माह की करें तो औसतन 400 मिली मीटर बारिश होनी चाहिए।
फिलहाल जिले के लगभग 70 प्रतिशत किसान धान की रोपाई नहीं कर पाए हैं। बारिश न होने से केवल वही किसान धान की रोपाई कर पाए हैं, जिन्हें नहरों या नलकूप का पानी मिल गया है। वहीं, कुछ किसानों ने महंगा डीजल लाकर पंपिंग सेट से सिंचाई कर धान की रोपाई की है, लेकिन चटक धूप के चलते खेतों में पानी रुक नहीं रहा है और पंपिंग सेट से सिंचाई करने वाले किसान भी आसमान की ओर टकटकी लगाए हैं। हालांकि, मौसम वैज्ञानिक 17 जुलाई से बारिश होने की प्रबल संभावना जता रहे हैं। बताते चलें कि जून से सितंबर माह तक खरीफ सीजन में औसतन 1145.5 मिलीमीटर बारिश होती है।
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बारिश न होने से परेशान किसानों ने बारिश के लिए टोटका करना भी शुरू कर दिया है। मंगलवार को चित्तौरा ब्लॉक के डुहरु गांव में बच्चों को बारिश के लिए काल-कलौटी (एक प्रकार का टोटका) खेलते देखा गया। इसमें छोट-छोटे बच्चों को जमीन पर पानी डालकर उसमें लोटते और काले बादलों से पानी बरसाने की प्रार्थना करते सुना गया।
कृषि विज्ञान केंद्र, प्रथम के प्रभारी वीपी शाही ने बताया कि धान की रोपाई के लिए 25 दिन की नर्सरी सबसे उपयुक्त होती है। नर्सरी की रोपाई लेट होने से इसका सीधा असर धान के उत्पादन पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि अगर धान की नर्सरी 40 से 45 दिन की हो जाती है और इसके बाद रोपाई की जाती है, तो बालियां जल्दी आ जाती हैं और उत्पादन 20 से 25 प्रतिशत तक घट जाता है।
आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय, फैजाबाद के मौसम विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आरएस मिश्रा ने बताया कि बहराइच, गोंडा, सुल्तानपुर व श्रावस्ती समेत पूर्वांचल के सभी जिलों में औसत से काफी कम बारिश हुई है, लेकिन किसानों को विचलित होने की जरूरत नहीं है। अभी सूखे जैसे हालात नहीं हैं। 17-18 जुलाई से बारिश की प्रबल संभावना है। वहीं, अगर एक सप्ताह के भीतर बारिश नहीं होती है तो सूखे के आसार बन जाएंगे। ऐसे में प्रशासन को आकस्मिक प्लान बनाकर किसानों की मदद करनी होगी और दलहनी फसलों की बोआई पर ध्यान देना होगा।
बारिश न होने का असर भूमिगत जलस्तर पर भी पड़ा है और जलस्तर घटने से पंपिंग सेट कम पानी दे रहे हैं। इससे किसानों का खर्च बढ़ गया है। खुटेहना निवासी किसान योगेश प्रजापति ने बताया कि बारिश न होने से पंपिंग सेट लगभग 20 प्रतिशत कम पानी दे रहे हैं जिससे खेती का खर्च बढ़ गया है। वहीं विशेश्वरगंज निवासी किसान सुशील मौर्य ने बताया कि बारिश न होने से सिंचाई में पानी अधिक लग रहा है। उन्होंने बताया कि पूर्व में जहां एक बीघे की सिंचाई में दो से ढाई घंटे पानी लगता था वहीं अब तीन से चार घंटे पानी चलाना पड़ रहा है। तेजवापुर के खैराबाजार निवासी किसान जगदीश व ख्वाजगीरपुर निवासी अयोध्या प्रसाद सिंह ने बताया कि पंपिंग सेट से की गई सिंचाई का पानी खेतों में रुक भी नहीं रहा है। चटक धूप के कारण एक-दो दिन में ही पानी सूख जाता है।
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