बहराइच। एसडीएम सदर पर दीवानी व तहसील के अधिवक्ताओं ने बदसलूकी आरोप लगाते हुए 18 जून से कार्य बहिष्कार शुरू किया था। वकीलों के कार्य बहिष्कार के शुक्रवार को 50 दिन पूरे हो रहे हैं। लेकिन वकीलों की मांग पर न ही एसडीएम को हटाया और न ही कोई वकीलों की मांग पर कोई सुनवाई हो सकी। कार्य बहिष्कार के चलते एसडीएम के न्यायालय पर वादों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। ऐसे मेें शासन की मंशानुसार वादकारियों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। मामले मेें जिला प्रशासन भी मौन धारण किए हुए है।
दीवानी व तहसील के वकीलों के वकीलों ने एसडीएम सौरभ पटेल पर भ्रष्टाचार व बदसलूकी आरोप लगाते हुए 18 जून को अधिवक्ता संघ की अगुवाई मेें एसडीएम कोर्ट का अनिश्चितकालीन बहिष्कार शुरू कर दिया था। पदाधिकारियों का आरोप था कि एसडीएम द्वारा मुकदमों मेें विधि विरुद्ध व मनमाने तरीके से निर्णय लिए जाते हैं। मामले मेें संघ के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री व डीएम को ज्ञापन भेजकर एसडीएम सदर को हटाने की मांग की थी। पदाधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि जब तक एसडीएम सदर को नहीं हटाया जाता है, एसडीएम कोर्ट का बहिष्कार चलता रहेगा।
हालात यह है कि शुक्रवार को वकीलों के कार्य बहिष्कार का 50वां दिन पूरा होने को है। ऐसे मेें न्याय पाने की आस मेें लगे वादकारी एसडीएम सदर के न्यायालय के चक्कर काट रहें हैं। लेकिन हर बार उनको मायूस होकर लौटना पड़ता है।
मालूम हो कि एसडीएम के न्यायालय पर मौजूदा समय पांच हजार से अधिक वाद लंबित हैं। जबकि वकीलों के कार्य बहिष्कार के दौरान प्रतिदिन औसतन 15 से 20 वाद आ रहें हैं। लेकिन इसके बावजूद अभी तक वकीलों की मांग पर न ही एसडीएम को ही हटाया गया और न ही वकीलों की मांग पर कोई सार्थक पहल करने की कोशिश की गई। अब सवाल यह उठता है कि सरकार द्वारा पीड़ितों को न्याय दिलाने का वादा कैसे पूरा होगा। यह भविष्य के गर्भ मेें हैं।
जिला अधिवक्ता संघ के निवर्तमान अध्यक्ष सूबेदार मिश्रा का कहना है कि संघ का प्रतिनिधि मंडल ने डीएम से मिलकर वकीलों की मांग को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई की आवाज उठाई जा चुकी है। लेकिन उस समय डीएम द्वारा यह कहा गया था कि पंचायत चुनाव मेें आचार संहिता का हवाला देकर एसडीएम को हटाने मेें असमर्थता जताई थी। उन्होंने बताया कि मामले मेें भाजपा जिलाध्यक्ष श्यामकरन टेकड़ीवाल ने भी शासन को पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की जा चुकी है। लेकिन अब पंचायत चुनाव भी समाप्त हो गया है और आचार संहिता, लेकिन इसके बाद भी संघ की मांग पर कोई विचार न किया जाना शासन की मंशा के अनुसार वादकारियों को न्याय कैसे मिलेगा इस पर सवाल उठने लगे हैं।