बहराइच। तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, यह दावा किताबी है। जनकवि अदम गोंडवी की ये पंक्तियां स्वास्थ्य महकमें पर सटीक बैठती हैं। जिले में संदिग्ध बुखार से हर रोज जिन्दगी की डोर टूट रही है। पिछले पांच महीने में 223 रोगियों की मौत दिमागी बुखार से हुई है। लेकिन संवेदनहीनता का सारी हदें तब पार कर गईं जब स्वास्थ्य विभाग ने महज तीन मौतों का दावा किया। विभाग ने दिमागी बुखार के संक्रमण काल से पूर्व न तो एहतियाती कदम उठाए न ही मरीजों का समुचित उपचार किया है। सर्वसुविधाओं से युक्त जेई/एईएस वार्ड होने के बावजूद एक-एक कर लोगों के घरों के चिराग बुझते गए। यह सिलसिला अभी भी जारी है, लेकिन विभाग ने जेई/एईएस की फाइल बंद कर दी है।
आमतौर पर हर साल अगस्त से अक्टूबर महीने के बीच दिमागी बुखार के मरीजों की संख्या में वृद्धि होती है। इसे जेई (जापानी इंसेफलाइटिस) और एईएस (एक्यूट इंसेफलाइटिस सिन्ड्रोम) का संक्रमण काल कहा जाता है। लेकिन इस साल बुखार का सिलसिला जून महीने में ही शुरू हो गया और यह दिनों दिन बढ़ता गया। लगभग 15 जून से शुरू हुए इस बुखार में अब तक 223 रोगी मौत के आगोश में खो गए। मरने वालों में अधिकतर मासूम हैं। यह सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। लेकिन अब तक हुई मौतों पर स्वास्थ्य विभाग मौन है। वह संदिग्ध बुखार को विभिन्न बहानों से जेई या एईएस मानने से इंकार कर रहा है। हालांकि इस साल अभी तक जिला अस्पताल में संदिग्ध दिमागी बुखार से पीड़ित 40 बच्चों के भर्ती होने की पुष्टि की है।
इनमें 18 बच्चे दिमागी बुखार पॉजिटिव पाए गए। लेकिन मौत के आंकड़ों में विभाग ने खूब खेल किया। महज तीन मौत होने की पुष्टि की गई है। जबकि अस्पताल के डेथ रजिस्टर की मानें तो 223 रोगियों की मौत दिमागी बुखार सेे हुई है। विभाग ने जेई/एईएस की फाइल बंद कर दी है।