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सत्ता के गलियारों में खो गया मासूमों का दर्द

Tue, 11 Feb 2014 05:43 AM IST
Bahraich
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बहराइच। लोग कहते हैं कि मैं कुछ समझ बोल नहीं पाता। डॉक्टर बताते हैं कि मेरी जुबान को आदेश देने वाले दिमाग में कुछ गड़बड़ी है, लेकिन मेरे दर्द को समझने की कोशिश करेंगे तो आप उस मौन कराहों को जरूर सुन सकेंगे जो देश व प्रदेश के हुक्मरानों तक जाते-जाते सत्ता के गलियारों में कहीं खो गई। सरकारी लापरवाही ने कई मासूम लाचारों की फौज खड़ी कर दी है। आखिर कसूर क्या है मेरा... क्यों हमें इलाज के बिना मर जाने या फिर हमेशा के लिए लाचार हो जाने के लिए छोड़ दिया गया। यह सवाल और बेबसी बयां करती हैं पल्लू की आंखें, जो दिमागी बुखार की जद में आकर शारीरिक रूप से अक्षम हो गया। वर्ष 2013 में जून से नवंबर तक 161 रोगियों की मौत हो गई, जबकि 10 ऐसे बच्चे हैं जो शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम हो गए। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग आंकड़ों में हेरफेर कर सिर्फ 25 पीड़ितों को मुआवजा देने की तैयारी कर रहा है।
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जापानी इंसेफलाइटिस की मार साल भर तराई के लोग झेलते हैं। 1995 से शुरू हुई इस बीमारी के लिए टीकाकरण की जरूरत वर्ष 2008 में जरूर समझी गई जबकि जापान में इससे पूर्व टीकाकरण शुरू हो चुका था। यानि कि 19 वर्ष तक लोगों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया गया। बच्चों के मरने का सिलसिला आज भी जारी है। वर्ष 2013 में करीब 161 रोगियों की मौत हुई है। शुरुआत में स्वास्थ्य विभाग ने महज छह बच्चों के मौत की पुष्टि की। विभाग की ओर से अब मौतों से जुड़ा एक नया आंकड़ा पेश कर शासन को रिपोर्ट भेजी गई है। इसमें कुल 42 केस हो गए हैं, जिनमें मौतों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है। विभाग के मुताबिक 10 ऐसे बच्चे हैं, जो दिमागी बुखार के प्रकोप सेे उबर तो गए लेकिन मानसिक व शारीरिक रूप से अक्षम हो गए हैं।
वर्ष 2012 में बालिका समेत चार बच्चे निशकत हुए थे, जबकि जिला अस्पताल के डेथ रजिस्टर के आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं जून से नवंबर तक 161 माताओं की गोद सूनी हुई तो किसी घर का पालनहार चल बसा। दिमागी बुखार से होने वाली मौतों को छुपाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने आंकड़ों में जमकर हेरफेर किया है। जमीनी हकीकत इससे परे है। बीमारी से बचने के लिए न तो एहतियात के तौर पर पूर्व में कोई कदम उठाए गए और न ही इलाज के लिए समुचित इंतजाम हुए। यहां तक कि जांच में भी भारी हीलाहवाली बरती गई। नतीजा दिमागी बुखार ने तराई में विकराल रूप ले लिया। प्रतिदिन औसतन दो मौतें होती रहीं। मासूमों की मौत पर खूब राजनीतिक रोटियां सेंकी गईं और यह मुद्दा जोर शोर से विधानसभा में भी गूंजा लेकिन हल नहीं निकला। अब महकमे की फाइल खुली तो स्थिति सामने है।
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