बहराइच। प्रदेश सरकार ने स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग के लिए वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना का खाका तैयार किया है। उसी के तहत जिले में गेहूं के डंठल से बनी कलाकृति उत्पाद को बढ़ावा देने की शुरुआत हुई है।
गेहूं के डंठल की कलाकृतियां बनाने के उद्योग को सरकार से मदद की दरकार है। इन कलाकृतियों के खरीदार सबल तबके के लोग हैं। बाजार उपलब्ध नहीं है, फिर भी शहर के दंपती इस बारीक हुनर की शाबाशी पूरे देश में पा रहे हैं।
दंपती अपने घर पर लगभग 300 लोगों को गेहूं के डंठल से कलाकृति बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। देश के अलग-अलग स्थानों पर लगने वाली प्रदर्शनी में कलाकृतियों को सराहा गया है।
पुरस्कार भी मिला है। लेकिन इन हुनरमंदों को खरीदारों के बाजार का इंतजार है। शहर के मोहल्ला नाजिरपुरा पूर्वी निवासी मोहम्मद यूनुस और उनकी पत्नी सादिका गेहूं के डंठल से कलाकृति को गढ़ने में पारंगत है।
डंठल से वे कलाकृतियों को जीवंत स्वरूप देते हैं। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व हरियाणा के पूर्व राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया के के हाथों दंपती पुरस्कृत हो चुके हैं।
वर्ष 2014 में छह सितंबर को दिल्ली में आयोजित प्रदर्शनी में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी से पुरस्कार हासिल कर चुके हैं। जबकि वर्ष 2005-06 में दिल्ली सरकार ने सम्मानित किया था।
यूनुस और उनकी पत्नी सादिका ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि तीन दशक से गेहूं के डंठल से कलाकृति बना रहे हैं। लेकिन बाजार की अनुपलब्धता के कारण कलाकृतियों को बेहतर खरीदार नहीं मिल रहे हैं।
यूनुस बताते हैं कि तीन वर्ष पूर्व जिला उद्योग केंद्र से प्रशिक्षण देने के लिए सेंटर मिलता था। लेकिन अब व्यवस्था खत्म हो गई। यूनुस और सादिका ने कहा कि प्रदेश सरकार ने जिले के उत्पाद के रूप में गेहूं के डंठल की कलाकृति को चयनित किया है।
यह उनके साथ ही कला का सम्मान है। तराई से बेहतर कलाकार निकलेंगे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के द्वारा उत्पाद चयन में गेहूं का ठंडल शामिल होने से लगा है कि उनकी मेहनत अब रंग लाएगी। बेहतर बाजार भी उपलब्ध हो सकेगा।
20 हजार में बिकी थी कलाकृति
यूनुस और पत्नी सादिका ने बताया कि उनकी बनाई सबसे महंगी कलाकृति कोलकाता में बीस हजार रुपये में बिकी थी। डंठल से ताज महल, लाल किला, संसद भवन, अक्षरधाम मंदिर, भगवान श्री कृष्ण, शिव समेत अन्य कई कलाकृतियां बना चुके है। घर पर ही सेंटर चलाकर दूसरों को भी हुनरमंद बना रहे हैं।
इन उद्योगों को भी मदद की दरकार
बहराइच का बरसोला उद्योग तराई की मिठास के रूप में जाना जाता है। लेकिन उपेक्षा के चलते यह उद्योग बंदी के कगार पर है। इसके अलावा जिले में बनने वाली छांटी दाल की महक देश के कई हिस्सों में पहुंचती थी।
अब छांटी दाल का उद्योग भी हाशिए पर है। शहर के गुलामअली पुरा मुहल्ले में गिलट के बर्तन का कारोबार भी कुछ घरों तक ही सीमित रह गया है। वहीं गोंद की चटाई और बेंत से बनने वाले फर्नीचर के उद्योग धंधे भी बंद हो चुके हैं।
अब खेतों में किसान नहीं जलाएंगे डंठल
गेहूं के डंठल यूनुस और सादिका मनमोहक कलाकृतियां गढ़ते हैं। प्रदेश सरकार ने इसे उत्पाद के रूप में चयनित किया है। जिससे अब गेहूं के डंठल का बेहतर उपयोग होगा।
अभी तक गेहूं के डंठल को किसान खेतों में जला देते थे। लेकिन कला के रूप में डंठल की मांग बढ़ने पर किसान उसे सहेजेंगे, इससे खेतों की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी। किसानों को भी लाभ होगा। साथ ही बहराइच की कला देश-विदेश में पहचान पाएगी।
-मोहन शर्मा, उपायुक्त उद्योग