बहराइच। पुस्तकों से ही सभ्यता और संस्कृति का विकास होता है। लोगों को पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान उपलब्ध कराने के लिए पुस्तकालयों की स्थापना की गई है। पाठकों के लिए हजारों की संख्या में विविध विषयों की मूल्यवान पुस्तकों का संकलन पुस्तकालयों में है, लेकिन लोग इन पुस्तकालयों की ओर रुख नहीं करते। जिससे यहां अक्सर सन्नाटा ही पसरा नजर आता है।
शहर के मोहल्ला खत्रीपुरा में जिले का सर्वाधिक पुराना राजर्षि पुस्तकालय स्थापित है। इसका निर्माण लगभग सौ वर्ष पूर्व करवाया गया था। यहां टालस्टाय, जवाहर लाल नेहरू, फिराक गोरखपुरी, प्रेमचंद समेत अन्य लेखकों की पुस्तकें व दुर्लभ पांडुलिपियां हैं, लेकिन पाठकों की संख्या आज तक सौ का आंकड़ा भी नहीं पार सकी है।
इसी प्रकार नगर के गेंद घर मैदान में स्थापित राजकीय पुस्तकालय में भी पाठकों के लिए लगभग 50 हजार से अधिक पुस्तकों का संकलन है। जिसमें इतिहास, भूगोल, अंग्रेजी विषयों के अतिरिक्त काफी संख्या में धार्मिक व ऐतिहासिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। हालांकि यहां पाठकों की पंजीकरण संख्या 800 के आसपास है। लेकिन नियमित रूप से आने वाले पाठक बमुश्किल 50 से 60 ही हैं।
पुस्तकालयाध्यक्ष वीके वर्मा ने बताया कि यहां आने वाले लोगों में अधिकतर छात्र-छात्राएं व विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लोग ही होते हैं। अन्य लोगों की दिलचस्पी कम ही रहती है। विद्यालयों में स्थित पुस्तकालय भी महज औपचारिकता निभाते प्रतीत हो रहे हैं।
किसान महाविद्यालय में छात्र-छात्राओं के लिए स्थापित पुस्तकालय में लगभग 27 हजार पुस्तकें उपलब्ध हैं। लेकिन छात्र-छात्राएं पुस्तकालय में अध्ययन करने के स्थान पर अपने विषय की पुस्तकें आवंटित कराकर घर पर ही अध्ययन करना पसंद करते हैं। इसके अलावा महाराज सिंह इंटर कॉलेज, राजकीय इंटर कॉलेज समेत अन्य विद्यालयों में भी पुस्तकालय की स्थापना है, लेकिन सभी का हाल एक जैसा ही है।
लोगों को जागरूक करने की जरूरत
पुस्तकालय भले ही काफी समय से ज्ञानवर्धन का साधन बना हुआ है। लेकिन कंप्यूटर युग पुस्तकों पर भारी पड़ रहा है। शिक्षक व साहित्यकार दिनेश त्रिपाठी शम्स का कहना है कि तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों को मनचाही जानकारी माउस क्लिक करते ही चंद सेकेंडों में मिल जाती है। इसीलिए लोग पुस्तकालयों की ओर आकर्षित नहीं होते। पुस्तकालयों को भी हाईटेक बनाने की जरूरत है। कवि शिवकुमार सिंह रैकवार का कहना है कि इंटरनेट हमारी जिंदगी की आवश्यकता बन गया है। लेकिन पुस्तकों के अध्ययन से विस्तृत जानकारी मिलती है। हालांकि पुस्तकों की खोज करने में पुस्तकालय में समय अधिक लगता है। ऐसे में भागमभाग जिंदगी में समयाभाव के कारण लोग पुस्तकालय की ओर रुख करने के स्थान पर नेट का सहारा लेना ही बेहतर समझते हैं। छात्र मो. मारूफ का कहना है कि युवा पीढ़ी कम समय में अधिक सफलता चाहती है। जबकि पुस्तकालयों में गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है। इसलिए पुस्तकालयों के प्रति आकर्षण घटा है। प्रदीप का कहना है कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी के बढ़ते कदमों के कारण पुस्तकालय व वाचनालय जैसे स्थानों में लोगों की रुचि कम रह गई है। इसके प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है।
वर्जन
स्कूलों में चलेगा जागरूकता अभियान
पुस्तकों को पढ़ने के लिए छात्र-छात्राओं को जागरूक किया जाएगा। इसके लिए स्कूलों में प्रार्थना के समय उन्हें स्वाध्याय के लाभ बताए जाएंगे। पुस्तकालयों की उपयोगिता पर भी चर्चा होगी। इस मामले में सभी स्कूलों के प्रधानाचार्यों को पत्र भेजा जा रहा है।
- राजेंद्र कुमार पांडेय, जिला विद्यालय निरीक्षक