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कतर्नियाघाट में तीन साल में दोगुनी हो गई गैंडों की संख्या

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बहराइच। कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में गैंडों की संख्या तीन साल में दोगुनी हो गई है। इस समय गैंडों का मूवमेंट गेरुआ नदी के पार ग्रासलैंड में है। गैंडों को देखकर ग्रामीण व वनकर्मी रोमांचित हो रहे हैं। सभी गैंडे नेपाल के नेशनल पार्क के बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कतर्नियाघाट की आबोहवा अनुकूल होने के चलते नेपाल से आए गैंडे यहीं के होकर रह गए।
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र बाघ और तेंदुओं के साथ दुर्लभ वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है। इस समय जंगल बंद हो चुका है। पर्यटकों का प्रवेश प्रतिबंधित है। लेकिन गेरुआ पार ग्रासलैंड में तीन दिनों से गैंडों का मूवमेंट मिल रहा है। कभी एक साथ दो गैंडे तो कभी तीन गैंडे दिखाई पड़ रहे हैं।

वन क्षेत्राधिकारी पीयूष मोहन श्रीवास्तव ने अमर उजाला से बातचीत करते हुए बताया कि स्थिति काफी सुखद है। कतर्निया सेंक्चुरी की आबोहवा गैंडों के अनुकूल होने के चलते नेपाल से आने वाले गैंडे कतर्निया में प्रवास कर रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों ने बताया कि तीन वर्ष पूर्व तीन से चार गैंडों का मूवमेंट गेरुआ पार के ग्रासलैंड में मिलता था।
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इसके अलावा जूही पाताल के जंगल में भी यही गैंडे प्रवास कर रहे थे। लेकिन तीन वर्षों में गैंडों की संख्या सात के आसपास पहुंच गई है। डीएफओ जीपी सिंह ने बताया कि गैंडों को कतर्नियाघाट सेंक्चुरी का माहौल 90 के दशक से रास आ रहा है। खाता कारीडोर के रास्ते गैंडों का झुंड अक्सर कतर्नियाघाट के जंगलों में आता था। फिर लौट जाता था। लेकिन वर्ष 2002 के बाद से गैंडों का जंगल में ठहराव होने लगा है। उन्होंने कहा कि हाल ही में वन्यजीवों की गिनती करायी गयी थी, जिसमें तीन नर, तीन मादा व एक शिशु गैंडे की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी।

रेडियो टैग लगे गैंडे पर रहती है नेपाल की नजर
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में गेरुआ पार के जंगलों में नेपाल से आने वाले गैंडों में एक रेडियो टैग लगा हुआ गैंडा भी शामिल है। रेडियो टैग लगे होने से जीपीएस सिस्टम के माध्यम से इस गैंडे पर नेपाल के वनकर्मियों पर नजर रहती है। हालांकि यह गैंडा कतर्नियाघाट के जंगलों में नियमित प्रवास नहीं करता। तीन से चार महीने के अंतराल पर इसका मूवमेंट भारत और नेपाल की सीमा पर होता रहता है।

गैंडों के अनुकूल है कतर्निया का जंगल
डीएफओ जीपी सिंह ने बताया कि गेरुआ पार घने जंगलों के बीच छोटे-छोटे तालाब हैं। गैंडा पूरी तरह शाकाहारी होता है। ऐसे में तालाब में गैंडे को शैवाल, कवक व मुलायम घासें आसानी से मुहैया हो जाती हैं। यही कारण है कि गैंडे कतर्नियाघाट के होकर रह गए हैं। संख्या निरंतर बढ़ रही है। कतर्निया का जंगल गैंडों के अनुकूल है
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