बड़ौत। तिलवाड़ा टीले पर खोदाई में मिले ताबूतनुमा आकृति, तांबे की प्लेट समेत अन्य पुरावशेषों को सुरक्षित लेकर जाने के लिए लकड़ी के फ्रेम तैयार कराए जाएंगे। वहां पर चल रही खोदाई का काम पूरा कर विराम लगा दिया है। शवाधान केंद्र की पुष्टि होने से टीला अब सिनौली की तरह खास हो गया है।
पुरावशेषों की प्राथमिक जांच के बाद पुरातत्वविदों ने यहां पर चार हजार साल पुराने शवाधान केंद्र होने की पुष्टि कर दी है। वहां काम पूरा होने के बाद खोदाई पर विराम लगा दिया गया है। अब ताबूतनुमा आकृति, तांबे की प्लेट समेत अन्य पुरावशेषों को सुरक्षित प्रयोगशाला लेकर जाना पुरातत्वविदों के लिए चुनौती है। जानकारी के अनुसार इनके लिए पहले लकड़ी के फ्रेम तैयार कराए जाएंगे। इसके बाद इन पुरावशेषों को ट्रेंचों से बाहर निकाला जाएगा।
यहां पर 18 ट्रेंचों में से पुरातत्वविदों को केवल दो ट्रेंच से ही बड़ी सफलता मिली हैं। एक ट्रेंच से खोदाई में पुरातत्वविदों को बड़ी ईंटों की एक दीवार मिली है। इससे संभावना जताई है कि यहां पर मानव बस्ती भी रही होगी।
शवाधान केंद्र व मानव बस्ती के प्रमाण मिलने से तिलवाड़ा का आला टीला सिनौली की तरह पुरातत्वविदों की दृष्टि से खास हो गया है। क्योंकि टीले पर इस तरह से अधिकतर पुरावशेष मिले हैं, जो सिनौली से पूरी तरह से मेल खाते हैं।