बागपत। उम्र के जिस पड़ाव में लोग रिटायर होकर बाकी जिंदगी आराम से जीने की सोचते हैं। वहीं, शूटर दादी चंद्रो तोमर ने उस उम्र में एयर पिस्टल थामकर इतिहास रच दिया। उन्होंने उपलब्धियों से साबित कर दिया कि इंसान यदि ठान ले तो कोई भी मुश्किल उसे रोक नहीं सकती। तमाम बंदिश और विरोध के बावजूद उन्होंने बागपत जिले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। महिला सशक्तीकरण की उनके जैसी मिसाल मिलना मुश्किल है। वह दुनियाभर की महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गईं। इसके चलते सैकड़ों लड़कियां निशानेबाजी में भविष्य बना रही हैं।
मुश्किलों का डटकर मुकाबला किया
शूटर दादी चंद्रो तोमर का हौसला कोई भी बंदिश और मुश्किल डिगा नहीं पाई। पौत्री शेफाली को शूटिंग सिखाने के लिए शूटर दादी चंद्रो तोमर ने छप्पर की शूटिंग रेंज में जब पहली बार कदम रखा तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि यह उनके नये सफर की शुरूआत है। पौत्री को एयर पिस्टल ठीक से पकड़ना सिखाते हुए उन्होंने टारगेट पर सटीक निशाना साधा। जिसे देख कोच डॉ. राजपाल सिंह ने उनके अंदर छिपे हुनर को पहचान लिया। हालांकि यह सफर आसान नहीं रहा। घर के पुरुषों ने उनकी निशानेबाजी का विरोध किया। गांव के लोगों ने भी उन पर तरह-तरह के तंज कसे। दूसरे राज्यों में होने वाली प्रतियोगिताओं में जब वह हिस्सा लेने जाती तो वहां भी उनका मनोबल तोड़ने की पूरी कोशिश की जाती। इसके बाद भी उन्होंने पीछे मुड़क़र नहीं देखा। आधी-अधूरी सुविधाओं के साथ उन्होंने निशानेबाजी सीखी और कई प्रतियोगिताओं में मेडल जीते। उनके इस जज्बे के चलते कई फिल्मी सितारे भी उनके फैन हो गए।
शूटिंग रेंज तैयार, नहीं करा पाईं उद्घाटन
शूटर दादी चंद्रो तोमर का सपना था कि जिले की प्रतिभाएं शूटिंग के क्षेत्र में देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन करें। खासकर यहां की लड़कियां शूटिंग के गुर सीखें। इसके लिए उन्होंने अपने गांव में एक इंडोर शूटिंग रेंज का निर्माण कराया। शूटिंग रेंज बनकर तैयार हो गई, लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते वह इसका उद्घाटन नहीं करा पाईं। उनके पुत्र विनोद तोमर का कहना है कि माताजी का सपना उनके सामने ही पूरा हो जाता तो अच्छा रहता। हालात सामान्य होने पर यह सपना हम पूरा करेंगे।