बेटा शहीद हुआ, बहू मायके गई और मां रह गई अकेली
कारगिल विजय दिवस
जिवाना गुलियान गांव के जितेंद्र सोलंकी ने शादी के चार माह बाद ही दे दी थी शहादत
अमर उजाला ब्यूरो
बिनौली (बागपत)। देश के लिए कारगिल की मॉस्को घाटी में जितेंद्र सोलंकी ने सर्वोच्च बलिदान दिया। जिवाना गुलियान गांव के लाड़ले जितेंद्र की बहादुरी पर 21 साल बाद भी ग्रामीणों को गर्व है। जितेंद्र ने मॉस्को घाटी में बलिदान की अमर कथा लिखी।
जिवाना गुलियान गांव के देशपाल सिंह के बेटे जितेंद्र सोलंकी देश सेवा के लिए 22 दिसंबर 1997 को 17 जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। भर्ती के करीब डेढ़ साल बाद ही कारगिल की लड़ाई छिड़ गई। मॉस्को घाटी में मोर्चा मिला। सात जुलाई 1999 को जितेंद्र सोलंकी ने दुश्मन का बहादुरी से मुकाबला करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
सरकार को करनी चाहिए थी और मदद
शहीद की मां ब्रह्म कौर बताती हैं कि शहादत से चार माह पूर्व ही जितेंद्र की शादी हुई थी। सरकार से मिली आर्थिक सहायता का एक हिस्सा माता पिता को भी मिला। बाकी उसकी पत्नी लेकर मायके चली गई। पेट्रोल पंप उसकी पत्नी को मिला, वहीं पर उसने दूसरी शादी कर ली। पिता का निधन हो चुका है। सरकार को परिवार की और अधिक आर्थिक मदद करनी चाहिए थी।
शहीद की याद दिलाता है गेट
शहीद की मां ब्रह्म कौर बताती हैं कि बेटे की याद में उसके नाम पर गांव में गेट का निर्माण कराया गया। पूरे इलाके को यही गेट शहीद की याद दिलाता है ।
ऐसी सेना दुनिया में किसी के पास नहीं : रमेश
सेवानिवृत्त सूबेदार रमेश चंद का कहना है कि कारगिल में भारतीय थल सेना और वायुसेना ने बहादुरी की मिसाल पेश की। ऐसी सेना दुनिया के किसी देश के पास नहीं है।