शाहपुर बाणगंगा से मिले टेराकोट रिंगवेल।
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बरनावा के पास हिंडन नदी के किनारे स्थित खेत की खुदाई के दौरान टेराकोट रिंग वेल (प्राचीन कुआं) मिला है। माना जा रहा है कि हजारों साल पहले यहां प्राचीन बस्ती रहती होगी, जिसमें इस कुएं का निर्माण कराया गया होगा। कुएं को देखने के लिए लोगों का जमावड़ा लग गया। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक का दावा है कि कुएं के पास हड़प्पा कालीन मृदभांड मिलने से सिंधु सभ्यता की मानव बस्ती के दुर्लभ प्रमाण मिले हैं।
शाहपुर बाणगंगा निवासी किसान अजय त्यागी और राजीव त्यागी अपने खेत को ट्रैक्टर से समतल करा रहे थे। बृहस्पतिवार शाम खेत में ट्रैक्टर फंस गया। किसानों ने कुएं जैसा गहरा गड्ढा देखा। फावड़े से खुदाई की तो मिट्टी की गोल आकृति दिखाई दी। रात होने पर किसान अपने घर चले गए, लेकिन शुक्रवार को हकीकत जानने के लिए दोबारा खेत में पहुंचे। करीब सात-आठ मीटर नीचे तक खुदाई की गई।
जेवी कॉलेज बड़ौत में इतिहास विभाग की प्रोफेसर डॉ विजय लक्ष्मी और एमएम कॉलेज गाजियाबाद में प्रोफेसर डॉ केके शर्मा का कहना है कि इस तरह के रिंगवेल से यहां प्राचीन बस्ती होने की पुष्टि होती है।
उधर, शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन मौके पर पहुंचे। उनका दावा है कि यह सिंधु सभ्यता की मानव पद्धति के टेराकोट रिंगवेल हैं। लोग पानी के लिए इस तरह के कुएं खोदते थे। यहां सिंधु सभ्यता की मानव बस्ती रही है।
कुछ हड़प्पा कालीन मृदभांड खंडित अवस्था में मिले हैं। टेराकोट रिंगवेल गोल पक्की मिट्टी के बने हैं। प्राचीन समय में मानव द्वारा अपनी बस्ती में बनाएं जाने वाले कुओं के प्रमाण है। हस्तिनापुर के अलावा दिल्ली के पुराने किले में इस तरह के अवशेष मिल चुके हैं। पुरातत्व विभाग को इसकी सूचना दी जाएगी।
सिंधु अवशेष मिलने से पहले भी बनी हैं सुर्खियां
बड़ौत। बागपत क्षेत्र पहले से ही पुरावशेषों के मिलने से सुर्खियों में रहा है। सबसे पहले बिनौली में मृदभांड मिलने से पुरातन विभाग ने कई माह तक इस साइट को कब्जे में लेकर कई महीने तक खुदाई की थी और काफी अवशेष यहां पाए गए थे। लेकिन बीच में ही इस खुदाई को रोक दिया गया। यदि यहां की फिर खुदाई शुरू की जाये तो और पुरावशेष यहां भारी मात्रा में मिल सकते हैं। इसके बाद चंदायन, बड़का, बामनौली के टीले से भी काफी मात्रा मेें पुरावेशष मिल चुके हैं।