बागपत में वर्ष 2009 में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर धोखाधड़ी एवं जालसाजी से ट्रैक्टर और किसान क्रेडिट कार्ड पर आठ लोगों को 66 लाख रुपये का लोन जारी करने के आरोपी तत्कालीन बैंक मैनेजर अनिल गोपाल गर्ग को क्राइम ब्रांच की टीम ने शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया। उसे कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया है।
क्राइम ब्रांच विवेचना विंग के इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह ने बताया कि बागपत इलाहाबाद बैंक के पूर्व मैनेजर नरेंद्र कुमार हाल निवासी (धोलड़ी रघुनाथपुर, मेरठ) ने वर्ष 2015 में बागपत कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि वर्ष 2009 में रमाला के श्रवण पुत्र कृष्णपाल, रमेश एवं नरेश पुत्रगण टीकाराम निवासी बसी, जयपाल पुत्र राजपाल निवासी सरूरपुर कलां, महक सिंह पुत्र नारायण सिंह निवासी सरूरपुर कलां, सत्येंद्र पुत्र श्याम सिंह निवासी गुराना, राजफूल पुत्र आशाराम, कृष्णपाल पुत्र उमराव सिंह निवासी बड़ौली ने फर्जी दस्तावेज से बैंक से ट्रैक्टर एवं किसान क्रेडिट कार्ड पर करीब 66 लाख रुपये का ऋण प्राप्त किया। समय पर लोन की किस्त जमा नहीं की तो आरोपियों के खिलाफ आरसी जारी हो गई थी।
गांव में जाकर जांच की गई तो मामला धोखाधड़ी का पाया गया। इस मामले में तत्कालीन बैंक मैनेजर अनिल गोपाल गर्ग, फील्ड ऑफिसर जगत सिंह के अलावा एडवोकेट बलदेव अग्रवाल बड़ौत (दस्तावेजों की जांच कर्ता), छपरौली के रविंद्र, जितेंद्र और पप्पू की संलिप्तता पाई गई। इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह का कहना है कि इस मामले में शुक्रवार को आरोपी रिटायर्ड बैंक मैनेजर अनिल गोपाल गर्ग को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया। वहां से उसे जेल भेज दिया गया है। आरोपी राजफूल पहले ही गिरफ्तार हो चुका है। अन्य फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे है।
फर्जीवाड़े का ऐसे हुआ भंडाफोड़
बागपत। क्राइम ब्रांच के मुताबिक बैंक से वर्ष 2009 में सत्येंद्र पुत्र श्याम सिंह ने लोन ले रखा था। किस्त जमा न करने पर बैंक से आरोपी के खिलाफ आरसी जारी हो गई थी। नोटिस चस्पा करने के लिए राजस्व विभाग की टीम गांव में पहुंची तो वहां पर इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं मिला। गांव के लोगों ने बताया कि पूरे गांव में इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं रहता है। बाद में गहराई से बैंक कर्मचारियों ने जांच की तो इसका पर्दा फास हो गया।
छपरौली का है रैकेट
बागपत। छपरौली कस्बे का रैकेट फर्जी लोन कराने का कार्य कर रहा था। वह लोगों के खुद ही फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिया करते थे। बाद में दस्तावेजों के आधार पर ऋण दिलवा दिया करते थे। इसमें आरोपियों का बड़ा कमिश्र होता था। इस गौरख धंधे में बैंक के कर्मचारी से लेकर मैनेजर तक संलिप्त थे।