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हस्तिनापुर में खुदाई करने से किया इंकार

Thu, 11 Jan 2018 01:34 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
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महाभारत के इतिहास का केंद्र माने जाने वाले हस्तिनापुर में खुदाई की संभावनाओं को भारतीय पुरातत्व विभाग ने नकार दिया है। नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट की पीआईएल पर हाईकोर्ट में पुरातत्व विभाग ने 67 साल बाद खुदाई की आवश्यकता से ही इंकार कर दिया। 
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महाभारत सर्किट के बरनावा में उत्खनन शुरू होने के बाद संस्था अब दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। संस्था का कहना है कि हस्तिनापुर का संरक्षण और उत्खनन जरूरी है। बड़े पैमाने पर उत्खनन हुआ तो यहां महाभारत कालीन चीजें मिलेगी, इससे लोगों को क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति जानने का अवसर मिलेगा।

हस्तिनापुर में वर्ष 1950 से 1952 तक भारतीय पुरातत्व विभाग ने बीबी लाल के निर्देशन में उत्खनन का कार्य कराया । महाभारत सर्किट या किसी टीले की बात करें तो इसके 67 साल बाद पुरातत्व विभाग ने बागपत के बरनावा में खुदाई शुरू की है।
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नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट मेरठ के संस्थापक एवं अध्यक्ष प्रियंक भारती ने बताया कि उन्होंने 67 साल पहले खुदाई का उदाहरण देकर हाईकोर्ट में पिछले वर्ष सितंबर में पीआईएल दाखिल की । संस्था ने कहा इतिहासकार बीबी लाल ने खुदाई का कार्य धनाभाव के लिए रोक दिया था और यह संभावना जताई थी कि यदि यहां खुदाई कराई जाए तो महाभारत कालीन कुछ चीजें मिल सकती हैं।

अधिवक्ता पंकज श्रीवास्तव और प्रियंक भारती ने बताया कि तीन जनवरी को भारतीय पुरातत्व विभाग ने जवाब दाखिल करते हुए कहा कि हस्तिनापुर में खुदाई की आवश्यकता नहीं है। जवाब के बाद संस्था बरनावा में उत्खनन का उदाहरण देकर दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी।


10 साल से महाभारत सर्किट में काम नहीं
बागपत। नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट मेरठ के संस्थापक एवं अध्यक्ष प्रियंक भारती ने बताया महाभारत सर्किट में खर्च का पर्यटन विभाग से ब्योरा मांगा  था। पिछले 10 साल में पर्यटन विभाग ने इस सर्किट में हस्तिनापुर में एक भी रुपया खर्च नहीं किया है। जबकि द्रोपदी मंदिर के लिए जिला योजना से इस बार 20 लाख का अनुमोदन किया है।

हस्तिनापुर में क्या-क्या मिला था
बागपत। हस्तिनापुर में पांच चरण में खुदाई का कार्य किया गया था। दूसरे चरण में हुई खुदाई में यहां कराया जा रहा कार्य प्रकाश में आया। हड्डियां, कांच की चूड़ियां , टेराकोटा पेंट, जानवरों की तस्वीरें, घोड़े की चित्र मिले, रिंग वॉल मिले। तांबे के सिक्के मिलने से संकेत मिले थे कि अर्थव्यवस्था विकसित थी। बेशकीमती पत्थर, शीशे, तांबे के छल्ले, चूड़ियां मिली थी।
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