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शौर्य दिवस के रूप में मनाया राऩी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस

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बड़ौत। युवाओं और नारियों की प्रेरणा स्त्रोत वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस नगर क्षेत्र मेें धूमधाम से मनाया गया। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस को नगर में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कोविड-19 के चलते कहीं विशेष कार्यक्रम नहीं हुए। इस दिन लोगों ने अपने घर में ही दीपांजलि कर रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस मनाया।
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क्या कहती हैं महिलाएं------
युवाओं की प्रेरणास्रोत हैं रानी लक्ष्मीबाई
बड़ौत। महिला सुदेश देवी का कहना है कि रानी लक्ष्मीबाई का व्यक्तित्व आज सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। रानी लक्ष्मीबाई 18 जून 1858 में ग्वालियर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ती हुई शहीद हुईं थी। उनके आदर्श आज युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रुप में हैं।
गौरवशाली इतिहास की प्रतीक हैं रानी लक्ष्मीबाई
बड़ौत। रेखा रानी कहती है कि वर्तमान समय में नई पीढ़ी को ध्यान देना चाहिए कि ब्रिटिश हुकूमत के संदेश से देश की आजादी का बिगुल झांसी की पवित्र धरती से फूंका था। रानी लक्ष्मीबाई हमारे इतिहास की प्रतीक बन गयी हैं।
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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
बड़ौत। मुकेश देवी का कहना है कि खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। इसी बलिदान के कारण रानी लक्ष्मीबाई शौर्य का प्रतीक बनकर नारी जागृति का कारण बनी थी।
झूठ व अन्याय के खिलाफ थी रानी
बड़ौत। रेखा चौधरी कहती है कि बचपन में इन्हें प्यार से लोग मनु, छबीली, मणिकर्णिका आदि नामों से पुकारते थे। बचपन में जब भारतीय छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां गुड्डे गुड़िया का खेल खेलते थे, तब मनु तलवार बाजी, घुड़सवारी का अभ्यास करती थी। बचपन से ही बहुत निडर थी। झूठ, अन्याय का साथ उन्होंने कभी नहीं दिया। सत्य का उन्होंने हमेशा साथ दिया।
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