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अब पहले जैसी होली कहां...

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बड़ौत (बागपत)। अब पहले जैसी होली कहां बेटे, अब तो लोग पुरानी रंजिशन निकालने के लिए इस त्यौहार को शुभ मानते है। पहले आपसी भाईचारे के साथ लोग धूमधाम से होली मनाते थे। रंग लगाने पर कोई बुरा भी नहीं मानता था। अब तो लोग जरा सी बात पर खून बहाने पर उतारू हो जाते है।
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जीवन के 62 वसंत देख चुके वीरेंद्र का कहना था कि पहले होली पर्व लोग एक-दूसरे के साथ धूमधाम से मनाते थे। गांव की महिलाओं से लेकर बच्चों तक घर-घर जाकर एक-दूसरे को रंग लगाते थे। अब माहौल बदल गया है। अब पहले जैसी बात कहां है। 60 वर्षीय अनिल का कहना था कि होली पर्व को देखते हुए एक माह पहले वसंत रखा जाता था। 15 दिन पहले से ही महिलाएं होली के गीत गाना शुरू कर देती थी। गांव के लोग हर्षोल्लास के साथ होली खेलते थे, लेकिन अब तो पुरानी रंजिश के लिए होली पर्व को शुभ माना जाता है। यदि कोई रंग लगा देता है तो उसके साथ झगड़ा शुरू कर दिया जाता है। अब तो पर्व मात्र औपचारिकता का रह गया है। 65 वर्षीय जगमेहर का कहना था कि पहले के समय में घर-घर जाकर भाभी-देवरानी-जेठानी व अन्य महिलाएं खूब होली खेला करती थी। अब बस सब कुछ मतलब का रह गया है। 58 वर्षीय राजपाल का कहना था कि युवा अब इंटरनेट व कंप्यूटर का आदी बन चुका है। होली, दीपावली आदि पर्वों को मात्र खानापूर्ति के लिए मनाया जाता है। होली पर्व पर युवा शराब पीता है। उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे पर्व को शांतिपूर्ण ढंग से मनाएं।
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