जिला बागपत का बड़ौत क्षेत्र पिछले एक दशक से लगातार इतिहासकारों द्वारा खोजे जा रहे पुरातात्विक प्रमाणों के कारण चर्चा में बना हुआ है।
अभी हाल ही में शहजाद राय शोध संस्थान के एतिहासिक स्थल सर्वेक्षण टीम के सर्वे में यह दावा किया गया है कि बड़ौत क्षेत्र का किशनपुर बराल गांव महाभारत काल से लगाकर मानव सभ्यता और संस्कृति का साक्षी रहा है।
संस्थान के निर्देशक अमित राय जैन ने कहा कि यह क्षेत्र इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यहां महाभारतकाल के दौरान किशनपुर गांव में ही श्रीकृष्ण और कौरव-पांडवों के पड़ाव रहे। महाभारत से जुड़ी अनेकों घटनाओं का केंद्र यह बागपत जनपद रहा।
महाभारत युद्ध से पूर्व की ज्यादातर घटनाएं यमुना नदी के इस पार के बागपत, मेरठ के हस्तिनापुर परिक्षेत्र में ही घटित हुई। किशनपुर गांव के नाम के संबंध में भी यह पुरानी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में जब भी थकावट महसूस करते थे, तो यमुना नदी पार कर यहीं किशनपुर बराल गांव में आराम करने के लिए पहुंच जाते।
जिस स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण रुकते थे, वहां पर कालांतर में एक विष्णु मंदिर का निर्माण किया गया। संस्थान की एतिहासिक स्थल सर्वेक्षण समिति के सदस्यों वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. कृष्णकांत शर्मा, डॉ. अमित पाठक, अमित राय जैन ने बताया कि वर्तमान में अभी फिलहाल जो मंदिर मौजूद है, उसकी स्थापत्य कला लगभग 300 वर्ष प्राचीन है।
हालांकि इसके गर्भगृह में जो प्राचीन प्रतिमा है, वह तकरीबन एक हजार वर्ष प्राचीन है। हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार के रूप में इस धरती पर आए। हो सकता है कि भगवान श्रीकृष्ण की स्मृतियों को सजोने के लिए ही भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर यहां पर स्थापित किया गया होगा।
इतिहासकारों का दावा है कि यहां से करीब 40 वर्ष पूर्व मंदिर से सटे प्राचीन तालाब से तकरीबन दो दर्जन प्राचीन मूर्तियां प्राप्त हुई थीं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार मूर्तियों के खंडित होने के कारण लोगों ने उन्हें यमुना नदी में कहीं विसर्जित कर दिया गया। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से अत्यंत निकट से जुड़ा होने के कारण किशनपुर गांव इतिहासकारों के लिए खोज का विषय बन गया है।
क्योंकि यहां स्थित मंदिर के एकदम किनारे पर लगभग आठवीं शताब्दी की प्राचीन ईंटों से निर्मित अष्टकोणीय सरोवर मौजूद है, जो कि इस स्थान के एतिहासिक और धार्मिक महत्व को दर्शाता है। हिंदू मान्यता के मुताबिक इस तरह के तालाब केवल तीर्थ स्थानों पर ही प्राचीन काल में निर्मित किए जाते थे।