-अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में मुनि विशुभ्र सागर महाराज ने किए प्रवचन
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बड़ौत। मुनि विशुभ्र सागर महाराज ने कहा कि भावना को हमेशा श्रेष्ठ ही मानना चाहिए। भावना भव नाशनी होती है। शुभ-भावना से शुभासव होता है और अशुभ भावना से अशुभ-आस्रव होता है।
जैन मुनि रविवार को अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भोग ही रोग है और अतिभोग भयंकर बीमारियों की जड़ है। भोगों में लिप्त होकर मानव दुर्गति को प्राप्त होता है। भोगों में लिप्त लंपटी मरकर दुर्गति को प्राप्त होता है। भोग-भावना योग-साधना की ओर नहीं बढ़ने देती है। सुख-शांति प्राप्त करना है, तो भोगों को छोड़कर योग धारण करो । त्याग ही सुख का साधन है। त्याग से आनन्द आता है। त्याग मुक्ति का साधन है। त्याग मुक्ति का द्वार है। त्याग के मार्ग पर चलने वाला परम-शांति को प्राप्त करता है। त्याग करो, मुक्ति प्राप्त करो। मलिन चित्त धारक शांति प्राप्त नहीं कर सकता। भोजन करना भी एक कला है। अति भोजन बीमारी एवं कुमरण का कारण बन जाता है। सभा में सुभाष जैन, प्रमोद जैन, राजकुमार जैन, हंस कुमार जैन, वरदान जैन, सुधीर जैन, अशोक जैन, विमल जैन, अंकुर जैन शामिल रहे।