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श्रद्धालुओं को अचौर्य धर्म का सिद्धांत समझाया

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बरनावा के श्री चंद्रप्रभु मंदिर में आयोजित विधान में पूजा अर्चना करते श्रद्घालु। - फोटो : BARAUT
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सिद्ध चक्र महामंडल विधान में श्रद्धालुओं ने 512 श्रीफल समर्पित किए
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिनौली। बरनावा अतिशय क्षेत्र की तपोभूमि पर स्थित श्री चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर 512 श्रीफल भगवान चंद्र प्रभु को समर्पित किए। ब्रह्मचारी प्रदीप पीयूष जैन जबलपुर ने श्रद्धालुओं को अचौर्य धर्म का सिद्धांत समझाया।
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अष्टह्निका महापर्व के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में ब्रह्मचारी प्रदीप पीयूष जैन जबलपुर ने कहा कि भगवान महावीर के पांच सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रह है। तीसरा अचौर्य धर्म है। किसी के गढ़े हुए, मकान, घर आदि में रखे, अमानत के तौर पर रखे हुए, किसी के मकान गली बाजार सड़क पर पड़े हुए, किसी के घर भूले हुए अथवा गलती से हिसाब किताब में भूल चूक होने पर, वाजिब निकलते हुए रुपये, पैसे, वस्त्र, आभूषण, अधिक थोड़े या अधिक धन को बिना दिए ना तो आप ग्रहण करें और ना उस धन को उठाकर किसी और को दें। इस प्रकार स्थूल चोरी का त्याग अचार्य अनुव्रत कहलाता है। स्वार्थ वश अन्य व्यक्तियों के धन आदि पदार्थों का अपहरण करना, निंदनीय अचौर्य कर्म है। यदि कोई संपत्ति या वस्तु सुपुर्द की जाए, उस वस्तु को हड़प कर लेना या थोड़ा देना भी चोरी में सम्मिलित है। चोरी के माल को थोड़े से मूल्य में लेना भी चोरी है। दूसरे मनुष्य को चोरी करने की प्रेरणा करना, उत्तेजना देना, चोरी डाके आदि कार्यों की प्रशंसा करना सर्वथा अनुचित है। दूसरे व्यक्ति की वस्तुओं को नाजायज दबाव डालकर धोखा देकर या बहला कर लेना भी अचौर्य व्रत के विरुद्ध है। विधान में दिनेश कुमार जैन, गीता जैन, रजनीश जैन, राजीव जैन, संभव जैन, उज्जवल जैन, बादामी जैन, कृष्णा देवी जैन, सरिता जैन, पूनम जैन आदि लोग रहे है।
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