हैरानी की बात यह है कि सरकार खाते में रकम भेजती रही और कर्मचारी जब तक हजम करते रहे। जब तक खाता कंगाल नहीं हुआ। फर्नीचर भी खरीदा गया और यात्रा भी हुई, लेकिन सिर्फ कागजों में। वर्तमान में इस कार्यालय की हालत बहुत दयनीय है। यहां न तो कंप्यूटर उपलब्ध है और न ही फर्नीचर की उचित व्यवस्था। यह बड़ा गोलमाल वर्ष 2010 से लेकर वर्ष 2017-2018 तक किया गया।
इस समय अवधि में हर साल यात्रा भत्ते के नाम पर 12 हजार, सामग्री खरीदने के लिए 10 हजार, एसएमसी ट्रेनिंग के नाम पर 7800, डीएफसी प्रशिक्षण के नाम पर 8 हजार सहित लगभग एक से डेढ़ लाख रुपये खर्च दर्शाया जाता था।
यानी आठ साल की इस अवधि में लगभग 10 लाख रुपये के गोलमाल की आंशका है। इससे भी हैरानी की बात मामला पकड़ में न आए, इससे पहले ही उक्त खाता बंद कर दिया गया और अब नया खाता नगर शिक्षा अधिकारी व सहायक वित्त एवं लेखाधिकारी के नाम से खोल दिया गया। किसी को कानोंकान खबर तक नहीं लगी। अब मामला पकड़ में आया तो शिक्षा विभाग के अफसरों में हड़कंप मच गया।
धनराशि कहां खर्च हुई मुझे नहीं पता : एबीएसए
एबीएसए वंदना सैनी ने बताया कि पहले नगर शिक्षा अधिकारी का खाता हुआ करता था, वह यूईआरसी के नाम संचालित था। उसे कुछ साल पहले बंद कर दिया गया और उसकी जगह नया खाता संचालित कर दिया गया। जब उनसे पूछा गया कि वर्ष 2010 से वर्ष 2017-2018 तक खाता संचालित था। उन्होंने बताया कि उक्त खाते में फर्नीचर, यात्रा भत्ता सहित सामग्री के लिए काफी धनराशि आती थी, लेकिन अब वह धनराशि कहा खर्च हुई, कहा गई, मुझे इसकी जानकारी नहीं है। यह जांच का विषय है, क्योंकि न तो हमें पासबुक दी गई है और न ही चेकबुक। अब खाता बिल्कुल शून्य है।