आपसी भाईचारे, मोहब्बत और सौहार्द का त्योहार है ईद-उल-फितर
अग्रवाल मंडी टटीरी। ईद-उल-फितर का त्योहार रमजान उल मुबारक के ठीक एक महीने यानि 30 रोजों के बाद आता है। इस्लामी कैलेंडर के दसवें महीने शव्वाल के पहले दिन मनाया जाने वाला यह त्योहार खुशियां लेकर आता है। इस्लामी कैलेंडर के सभी महीनों की तरह यह महीना भी नए चांद को देखकर शुरू होता है।
ईद का चांद दिखने पर उसके अगले दिन चांद की पहली तारीख को ईद मनाई जाती है। ईद के अवसर पर पूरे महीने अल्लाह के बंदे अल्लाह की इबादत करते हैं, रोजे रखते हैं और कुरआन-ए-पाक की तिलावत करते हैं। ईद मनाने का एक और अहम मकसद है कि ईद के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना वाजिब है। ताकि जो लोग गरीब हैं और मजदूर हैं वह अपनी ईद मना सकें, नए कपड़े पहन सकें और घर में खीर-शीर बनाने के साथ मिठाइयां खा सकें। जकात और फितरा की धनराशि से गरीबों की मदद की जाती है। संवाद
मदरसे और यतीमखाने को भी मदद
हाफिज वकील अहमद और मौलवी आजम कहते हैं कि रमजान में जकात और सदका-ए-फितर की धनराशि मुस्लिम समाज मदरसों और यतीमखाने को भी देता है। जिससे उनके संचालन में दिक्कतें न आए। इस रकम को जुटाने के लिए मदरसों एवं यतीमखानों के संचालन लंबी-लंबी यात्राएं भी करते हैं। कोरोना संक्रमण के दौर में इस बार बाहर नहीं जा पाए तो ऑनलाइन भी यह रकम जुटाई जा रही है।
क्या है जकात
रमजान में हर हैसियतमंद मुसलमान का जकात बांटना वाजिब बताया है। आमदनी से पूरे साल में जो बचत होती है उसका ढाई फीसदी हिस्सा किसी गरीब या जरूरतमंद को दिया जाता है। जिसे जकात कहते हैं।