बागपत। किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह का जन्म भले ही नूरपुर (गाजियाबाद) में हुआ हो, लेकिन वह हमेशा बागपत के होकर रहे। साल 1937 में पहले चुनाव से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक छपरौली से उनका गहरा नाता रहा। यहां के कण-कण में आज भी उनकी यादें और बातें बसी हुई है।
मेरठ जिले में तब गाजियाबाद और बागपत तहसील हुआ करती थी। वर्ष 1937 में संयुक्त प्रांत धारा सभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर दक्षिण-पश्चिम सीट यानि की बागपत और गाजियाबाद से वह पहला चुनाव लड़ें। कुल मतों के 78.06 प्रतिशत मत हासिल कर उन्होंने नेशनल पार्टी के प्रत्याशी को हराया था। यहां दिनोंदिन उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ता गया। किसानों की धड़कन बन गए बड़े चौधरी छपरौली में हमेशा अजेय रहे। यही अकेली ऐसी सीट है, जिस पर अभी तक रालोद कोई चुनाव नहीं हारी। यहां से वह वर्ष 1937, 1946, 1952, 1957, 1962, 1967, 1969 और 1974 में विधायक चुने गए और लखनऊ में छपरौली की आवाज बनकर रहे। पहला लोकसभा चुनाव मुजफ्फरनगर से लड़े, लेकिन हार गए। इसके बाद वह बागपत सीट से चुनाव लड़े। वर्ष 1977 में यहीं से पहली बार सांसद बने और देश के गृह मंत्री बने।
सियासत के 5 दशक, 7 पार्टियां
बागपत (ब्यूरो)। चौधरी चरण सिंह आजादी के आंदोलन में जेल भी गए। कांग्रेस से जुड़े और सबसे लंबे समय तक पार्टी में रहे। खेती किसानी के मुद्दे पर कांग्रेस नेताओं से सीधा टकराव हुआ। कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में सहकारी खेती का विरोध किया। 45 साल के सियासी कॅरियर में उन्होंने सात पार्टियां बनाईं। चौधरी चरण सिंह ने वर्ष 1937 में संयुक्त प्रांत धारा सभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर मेरठ की दक्षिण-पश्चिम सीट (जिसमें तब गाजियाबाद व बागपत तहसील थी) से चुनाव लड़ा था। नागपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 64वें अधिवेशन में चरण सिंह ने सहकारी खेती के विरोध में आक्रामक भाषण दिया था। उन्होंने सहकारी खेती को एक व्यवस्था के तौर पर, भारतीय स्थितियों के प्रतिकूल बताया। इसके बावजूद सहकारी कृषि के पक्ष में प्रस्ताव पारित हुआ। यहीं से वे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के निशाने पर आने शुरू हो गए थे। हालात इतने बिगड़े कि वर्ष 1967 में उन्होंने जन कांग्रेस बनाई। वर्ष 1968 में भारतीय क्रांति दल, वर्ष 1974 में भारतीय लोकदल, वर्ष 1977 में जनता पार्टी, वर्ष 1980 में लोकदल और वर्ष 1984 में आखिरी बार दलित मजदूर किसान पार्टी का गठन किया था। उन्होंने किसान और मजदूर के हितों से कभी समझौता नहीं किया।
खाली था पूर्व पीएम का बैंक खाता
बागपत। चौधरी चरण सिंह सादगी की मिसाल थे। वह रुपये को न तो घर रखते थे और न ही बैंक खाते में। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उनके निधन के बाद देखने को मिला। निधन और अंतिम संस्कार के बाद जब उनके खाते को चेक कराया तो उसमें सिर्फ 470 रुपये थे। करोड़ों रुपये की संपत्ति के मालिक वर्तमान राजनेताओं के लिए यह बड़ा उदाहरण है।