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बुलेटप्रूफ ट्रैक्टर में आते हैं और दबंगई दिखाते हैं

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बुलेटप्रूफ ट्रैक्टर में आते हैं और दबंगई दिखाते हैं
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बागपत। हरियाणा राज्य की सीमा में स्थित यूपी के किसानों की भूमि पर वहां के किसान मालिकाना हक जताते हैं। बुलेटप्रूफ ट्रैक्टरों में सवार होकर हथियारों के साथ आते हैं और दबंगई दिखाते हैं। फायरिंग करने और किसानों को ट्रैक्टर से कुचलने के प्रयास कई बार कर चुके हैं। यूपी के किसानों को जान हथेली पर रखकर अपनी जमीन पर खेती करनी पड़ती है। यूपी के अधिकारी कोई सुनवाई नहीं करते हैं। इसी वजह से नंगला बहलोलपुर के किसान अनिल को अपनी जान गंवानी पड़ी।
सोनीपत के किसान फसल की बुआई और कटाई के समय यूपी के किसानों का विरोध करते हैं। हरियाणा राज्य की सीमा में जमीन होने की वजह से यहां के किसानों को ज्यादा मदद भी नहीं मिल पाती है। यूपी के अधिकारी दूसरे राज्य की सीमा का हवाला देकर हाथ खड़े कर लेते हैं। नंगला बहलोलपुर के किसान सुनील यादव, मनवीर यादव, चिराग, धर्मपाल आदि ने बताया कि हरियाणा के किसानों ने अपने ट्रैक्टरों पर बुलेटप्रूफ केबिन बनवा रखे हैं, जिनमें वे हथियारों से लैस लोग लेकर आते हैं। कोई भी विवाद होने पर यूपी के किसानों पर सीधे फायरिंग कर देते हैं। कभी फसल काटकर ले जाते हैं, तो कभी रातोंरात फसल नष्ट कर देते हैं।
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45 साल से चल रहा सीमा विवाद
यमुना खादर में हरियाणा और यूपी के किसानों का विवाद करीब 45 साल से चल रहा है। 1979 में गठित दीक्षित अवार्ड के बाद भी इस विवाद का कोई हल नहीं निकला है। दोनों राज्यों के अधिकारियों की भी कई बार इस मुद्दे पर बैठक हो चुकी है, मगर हालात जस के तस हैं। यूपी के निवाड़ा, नंगला बहलोलपुर, ककौर, कोताना, लुहारी, खेड़ा इस्लामपुर, टांडा समेत 27 गांवों और हरियाणा के खोजकीपुर, खुर्रमपुर, जाजल समेत करीब 22 गांवों के किसानों के बीच तनातनी चल रही है। बागपत जिले से हरियाणा के सोनीपत और पानीपत के यमुना खादर की करीब 50 किमी सीमा सटी हुई है। यमुना के पानी के कटाव के कारण करीब 4500 हेक्टेयर भूमि का विवाद है। बागपत के किसानों की करीब 2850 हेक्टेयर और हरियाणा के किसानों की करीब 1750 हेक्टेयर भूमि है।
क्या था दीक्षित अवार्ड
यूपी और हरियाणा के किसानों के बीच सीमा विवाद के निपटारे के लिए वर्ष 1979 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री उमाशंकर दीक्षित की अध्यक्षता में दीक्षित अवार्ड का गठन किया था। तय हुआ था कि वर्ष 1974 की यमुना की धारा को आधार मानकर सीमांकन कराया जाए। यमुना खादर में सीमांकन कराकर पिलर लगवा दिए गए। लेकिन कुछ दिन बाद ही पिलर गायब हो गए। किसानों के बीच खूनी संघर्ष होने के बाद वर्ष 2007 में यहां दोबारा पिलर लगवाए गए। 2012 में आई बाढ़ में फिर कुछ पिलर बह गए। 2013 में दोनों राज्यों के किसानों के बीच सहमति बनी थी कि जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आता, कोई विवाद नहीं होगा। लेकिन फसल की कटाई और बुआई के समय किसान फिर आमने-सामने आ गए।
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कई बार हो चुका खूनी संघर्ष
- 20 नवंबर 1997 को दोनों राज्यों के किसानों के बीच फायरिंग में कुर्डी गांव के विशंभर की मौत हो गई थी।
- 20 अक्टूबर 1998 को हरियाणा के किसानों ने नंगला बहलोलपुर गांव में फायरिंग की थी। करीब 80 घरों को आग के हवाले कर दिया था।
- 19 नवंबर 2008 को हरियाणा के मनौली गांव के किसानों ने काठा गांव के किसानों की 150 बीघा फसल नष्ट कर दी थी।
- 2008 में हरियाणा के किसानों ने सिसाना गांव के किसानों पर फायरिंग की थी। इसके अलावा भी छिटपुट हिंसक झड़प दोनों राज्यों के किसानों के बीच होती रहती हैं।
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