किसानों के मसीहा चौधरी चरणसिंह ने पूरी सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ एवं सुव्यवस्थित करने के लिए मंडल का गठन कराया। उन्होंने गुलामी का कारण जातिवाद को ही माना और शैक्षणिक संस्थाओं, लोक सेवा में प्रवेश के लिए जाति पूछे जाने पर रोक के लिए प्रस्ताव रखा तथा बहुमत से पास कराया था।
यहां तक कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी के सभी सदस्यों को भी किसी जाति के आधार पर बने संगठन से जुड़ने का विरोध किया था। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह 1939 में कांग्रेस विधायक दल की बैठक में यह प्रस्ताव लाए थे। प्रस्ताव में कहा गया था कि जो भी हिंदू प्रत्याशी शैक्षणिक संस्था या लोक सेवा में प्रवेश प्राप्त करे उसकी जाति के बारे में न पूछा जाए।
सिर्फ इतना मालूम किया जाए कि वह दलित है अथवा नहीं। इसके बाद 22 मई 1951 में उन्होंने प्रदेश कांग्रेस कमेटी की बैठक में इस प्रस्ताव को रखा कि कोई भी कांग्रेस सदस्य अपने को किसी जातिवादी संगठन अथवा संस्था से नहीं जोड़ेगा। उन्होंने कहा कि जातिवाद का ही परिणाम था कि भारतीयों ने सैकड़ों साल गुलामी का जुआ अपने कंधों पर ढोया।
यही नहीं उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा कि संविधान में संशोधन कर ऐसी व्यवस्था की जाए कि राजपत्रित पदों पर उन्हीं युवक-युवतियों को चुना जाए जो अपनी जाति से बाहर विवाह करने को तैयार हों। उन्होंने जातिवाद को लेकर ''हू इज कास्टिस्ट : एन एनालॉयसिस'' (जातिवादी कौन : एक विश्लेषण) नाम से एक किताब भी लिखी।
कॉलेजों का नाम तक बदलवा डाले ः चौधरी चरणसिंह ने 1967 में मुख्यमंत्री बनते ही शासनादेश जारी कर दिया कि जो शिक्षण संस्थाएं किसी जाति विशेष के नाम से चल रहीं हैं, उनका शासकीय अनुदान बंद कर दिया जाएगा।
इस आदेश के बाद अग्रवाल कॉलेज का नाम महाराजा अग्रसेन कॉलेज, रस्तोगी कॉलेज का नाम महाराजा हरिश्वचंद्र कॉलेज, जॉट कॉलेज, महर्षि दयानंद और जनता वैदिक कॉलेज के नामों में परिवर्तित हो गए। जाति के स्थान पर महापुरुषों के नाम पर कॉलेजों का नाम रखा गया।
चकबंदी कानून बनवाकर बढ़वाई कृषि उपज
चौधरी चरण सिंह ने कृषि एवं राजस्व मंत्री के कार्यकाल के दौरान चकबंदी कानून बनाया और खेतों के चक बनवा दिए। 1954 से पूरे प्रदेश चक बनवा दिए गए।
जमींदारी उन्मूलन से दिलाए गरीबों को अधिकार
चौधरी चरण सिंह ने जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार विधेयक लागू कराया, जिससे पिछड़े, गरीब, दलित एवं शोषितों को उनके रहने वाली जमीन को उन्हें ही आवासों के लिए दिलाया गया। इसके खिलाफ कोर्ट में भी मामला चला, लेकिन इस विधेयक को ठीक माना गया। इस विधेयक की विदेशों से भी प्रशंसा की गई।