बागपत। तिलवाड़ा के आला टीले पर चल रहे उत्खनन में पुरातत्वविदों को बड़ी कामयाबी हासिल हुई। यहां पर सिनौली की तरह पुरावशेष के रूप में तांबे की प्लेट और कलाकृति बने यंत्र मिले हैं, जो ताम्रपाषाण कालीन बताए गए हैं। प्राचीन पुरावशेष मिलने से पुरातत्विद व शोधार्थी बेहद उत्साहित हैं।
तिलवाड़ा के आला टीले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का मेरठ मंडल कार्यालय की तरफ से पिछले ढाई माह से उत्खनन कार्य चल रहा है। यहां पर तीन ट्रेंच में खोदाई की जा रही है। मगर, अभी अभी तक एक ही ट्रेंच से अहम पुरावशेष सामने आ रहे है। यहां पर अभी तक मृद भांड, मिट्टी के सुराहीनुमा बर्तन, हडि्डयां मिल चुकी हैं।
इसके अलावा चबुतरानुमा आकृति मिल चुकी हैं। इसके आधार पर शवाधान केंद्र होने की उम्मीद जताई गई है। मगर, अभी तक इतिहासकरों ने इस पर अपनी मुहर नहीं लगाई है। उत्खनन के चलते आला टीले पर तांबे की प्लेट, कलाकृति बने वाद्यनुमा यंत्र मिला है। इस यंत्र पर कलाकृति काफी प्राचीन है। इसके अलावा इसपर शोध के बाद काफी अहम इतिहास पता चलेगा।
यह पुरावशेष सिनौली में उत्खनन में मिले पुरावेशषों की तरह प्राचीन बताए गए है। पुरावशेषों को देखते हुए यह तिलवाड़ा का आला टीला सिनौली से भी खास हो गया है, जिस पर पुरातविदों की नजरें टिक गई हैं। संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही यहां पर भी सिनौली की तरह देशभर के पुरातत्वविद व इतिहासकारों का जमावड़ा लगेगा। पुरावशेषों के नजरिए से तिलवाड़ा का आला टीला कुछ नया इतिहास लिखने जा रहा है।
n सिनौली में रथ, जुआ, मनकों का हार मिला था : दिलचस्प बात यह है कि तिलवाड़ा आला टीला सिनौली से मात्र 10 किमी की दूरी पर स्थित है, जहां पहले रथ, मनकों का हार, तांबे की तलवार के अलावा अन्य पुरावशेष मिले थे। इनके मिलने पर यहां पर पुरातविदों ने मानव बस्ती की मुहर लगा दी थी। यहां पर योद्धाओं के शवों के दफनाने के प्रमाण मिले थे। देश में यह काल लगभग 2000 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व तक चला था। सिनौली साइट के अलावा चंदायन में की खोदाई में भी इस तरह के प्रमाण मिले है। क्योंकि यहां पर मुकुट मिला था। इसे इतिहासकारों ने हड़प्पाकालीन बताया था।
n ताम्रपाषाणिक काल का आला टीला : तिलवाड़ा के आला टीले पर तांबे की प्लेट मिलने से बेहद खास हो गया है। इतिहास की दृष्टि से इस काल में चित्रित मिट्टी के बर्तन होते थे और पशुपालन, गेहूं, चावल, बाजरा, दालें, कपास आदि की खेती की जाती थी। मिट्टी की ईंटों से बने घरों में लोग रहते थे। आभूषणों और सजावट के लोग शौकीन होते थे। राजस्थान का गिलुंद और अहर महाराष्ट्र का प्रवरा नदी तट पर स्थित जोरवे ताम्रपाषाणकालीन है।