लौहड्डा, वाजिदपुर, सिरसली, बड़ौत, जौनमाना, लुहारी, छपरौली और हजूराबाद गढ़ी जैसे गांवों में अब पिता खुद बेटियों के कोच बन गए हैं। सिरसली की अनु, लौहड्डा की सिया, वाजिदपुर की पूनम, बड़ौत की सोनम तोमर, छपरौली की रूबी, जौनमाना की अंशिका, हजूराबाद गढ़ी की रुचिका और दिव्या शर्मा जैसी दर्जनों बेटियां हर दिन पुराने बल्ले और टेनिस बॉल से अभ्यास करती दिखती हैं। इनके पास ब्रांडेड किट नहीं, लेकिन दिल में ‘भारत’ लिखे सपने जरूर हैं।
एकेडमी में बढ़ रही बेटियों की संख्या
विश्वकप की जीत ने न सिर्फ गांवों में उत्साह जगाया है बल्कि खेल की दिशा भी बदल दी है। नगर और ग्रामीण क्षेत्रों में चल रही क्रिकेट एकेडमियों में बेटियों का नामांकन बढ़ा है। विश्वकप के बाद करीब 50 से अधिक बेटियों ने पंजीकरण कराया है।