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आखिर कोई तो सुने, क्रांतिकारी गांव बसौद का दर्द

Wed, 10 May 2017 12:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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बसौद गांव स्थित मस्जिद। - फोटो : बसौद गांव स्थित मस्जिद।
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बागपत। बसौद का सीना गर्व से चौड़ा है, होना भी चाहिए। इसे लोग क्रांति गांव कहते हैं। अफसर भी आते हैं, इतिहास जानने के लिए, कितने लोग आए, किताबें भी खूब लिखी गई, लेकिन सदियां बीत जाने के बावजूद यहां के लोगों का दर्द किसी ने नहीं बांटा। जिस शहादत से आजाद हवा की चिंगारी फूटी, उनकी संतानों को सिर्फ क्रांति द्वार मिला है। जबकि गांव को जरूरत है अस्पताल, बैंक और स्कूल की। 
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 बिजरौल के बाबा बागपत ही नहीं वेस्ट यूपी की क्रांति के अगवा लोगों में से एक थे। क्रांति का उन्हें जो मोर्चा मिला, उसमें बसौद की भूमिका अहम रही। शाहमल ने रणनीति बनाकर बसौद की जामा मस्जिद को क्रांति का कार्यालय और रसद रखने की जगह तय की, लेकिन एक मुखबिर ने यह सूचना अंग्रेजों तक पहुंचा दी।

आजादी के परवानों को इसका खामियाजा भुगतान पड़ा। अंग्रेजों ने मेजर विलियम के नेतृत्व में गौरी पलटन के साथ बसौद पर हमला किया। गोलियों से 180 लोग शहीद हुए थे। घर-घर में आग लगा दी। खूनी तालाब, जामा मस्जिद और बरगद गवाह है कि बसौद के लोगों ने 10 घंटे अंग्रेजों का मुकाबला किया और देश में क्रांति की ज्वाला फूंक दी। गांव में सिर्फ 15 लोग बचे थे। यहां लोगों को शहादत पर गर्व है, लेकिन सरकार से नाराजगी भी है।
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अंग्रेजों को अचल ने दौड़ाया था उल्टे पांव 
बागपत। अचल सिंह गुर्जर विधुड़ी दिल्ली के तुगलकाबाद गांव के मूल निवासी थे। परिवार के लोगों के साथ नौरोजपुर गांव में बस गए थे। लोग उसे दादा अचलू कह कर पुकारते थे। उनके दिल में भी अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ गुस्सा पनपा। 1857 में भड़की क्रांति की ज्वाला से उन्होंने भी ग्रामीणों के साथ सभाएं करनी शुरू कर दी थी। महान क्रांतिकारी बिजरौल के बाबा शाहमल के साथ जुड़े गए। देश को आजादी दिलाने के लिए अचल सिंह गांव के लोगों के साथ सभा कर रहे थे। लोगों की भीड़ को देखकर अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और उन्होंने पहले अचल सिंह को ही निशाना बनाया। उन्हें गिरफ्तार कर तोप से उड़वा दिया था। इसी दौरान बाबा शाहमल को पैर में गोली लग गई थी। इसके बाद अंग्रेजों ने उनके परिवार को सताना शुरू कर दिया था। नौरोजपुर गुर्जर गांव में अचल सिंह के वंशज रहते हैं।
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