रमाला(बागपत)। सबीला को गोलियां लगी थीं। बदन लहूलुहान था। चल भी नहीं पा रही थी। फिर भी खुद को घसीटते हुए पड़ोस तक पहुंची। दरवाजे पीटे , चीखी - चिल्लाई, ऊपर वाले का वास्ता भी दिया , लेकिन कोई बाहर नहीं निकला। थोड़ी देर में वहीं पर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। फिर भी दरवाजा नहीं खुला। कैसे खुलता, दहशत के मारे दम सूख गया था लोगों का। गोलीबारी से इतने खौफजदा हो गए कि आठ - दस को उल्टी-दस्त लग गए। पुलिस के आने तक घर से बाहर निकलना तो दूर , एक ने भी खिड़की से झांका तक नहीं। एक घंटा तक घायल सड़क पर ही तड़पते रहे।
अगर गांव वालों ने हिम्मत दिखाई होती तो शायद बुल्लो की जान बच जाती। अबलू को तो इतनी बेरहमी से मारा गया था कि मौके पर ही उसका दम निकल गया। घर में सात लोग थे। अबलू, उसकी पत्नी सबीला, तीन बेटे इखलाक उर्फ काला, आबिद, नसीम, बेटी गुलशाना उर्फ बुल्लो और पुत्रवधू साजिदा। उसका एक बेटा तासीन बाहर गया हुआ था।
घायल काला, सबीला और साजिदा को भी पुलिस ने अस्पताल पहुंचाया। अबलू के घर के ठीक सामने कफील का मकान है। उसने गोली की आवाज सुनी, लेकिन डर के मारे बाहर नहीं निकल सका। उसने बताया कि कुछ देर बाद एक दो लोगों ने घायलों को अस्पताल ले जाने की सोची, लेकिन उन्हें किसी ने ट्रैक्टर या कार नहीं दी। पड़ोस के चौधरी यामीन ने बताया कि फायरिंग के बाद मोहल्ला बुरी तरह डर गया था, इसलिए कोई भी घायलों को अस्पताल नहीं ले गया। दूसरा डर ये था कि कहीं मदद करके पुलिस के चक्कर में न फंस जाएं।
खानदान का खात्मा करना चाहते थे
हत्यारों ने जिस तरह अबलू और उसके परिवार वालों को चुन चुनकर गोलियां मारी, उससे साफ है कि उनका इरादा पूरे खानदान को मौत के घाट उतारने का था। जो जहां मिला, उसे वहीं गोली मार दी गई। घर पर मौजूद सात लोगों में से सिर्फ अबलू के बेटे आबिद और नसीम गोली लगने से बचे। पड़ोसियों ने बताया कि इन दोनों ने भागकर जान बचाई। अंधेरे के चलते ये हत्यारों की नजर से बचकर निकल गए।