बागपत। खेत-खलिहान तक फैली हैं पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह की यादों और बातों की खुशबू। किसानों की समस्याएं बढ़ती गई, लेकिन बड़े चौधरी जैसा रहनुमा अब कोई नहीं दिखता। गन्ने के बकाया भुगतान, बिजली बिल, डीजल के दाम और उर्वरकों की कीमतें बढ़ी है, लेकिन किसान आंदोलन की अगुवाई करने के लिए ऐसा कोई भरोसेमंद चेहरा तक नहीं है।
नौरोजपुर गुर्जर गांव निवासी लोकतंत्र सेनानी जयपाल सिंह बड़े चौधरियों के नजदीकियों में शामिल रहे। जयपाल सिंह कई बार उनके साथ जेल गए। बड़े चौधरी का जिक्र छिड़ते ही वह भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि उनके जैसा किसान मसीहा फिर जन्म नहीं लगा। सियासी हितों के लिए अब लोग उन्हें याद कर रहे हैं, जबकि हकीकत में उनकी नीतियों और आदर्शों पर चलता कोई नहीं दिखता है। किसानों के बीच बैठने वाला उनके जैसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ। ज्ञान का खजाना थे और उन्होंने किसान के दर्द को समझा, समाधान भी किया। देश और प्रदेश के किसानों ने जो तरक्की की है, वह सिर्फ उनकी नीतियों की बदौलत ही संभव हो सका है।
पूर्व विधायक डॉ. महक सिंह कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह एक विचारधारा थे। उनके जैसा लीडर विपक्ष में भी दहाड़ता था। चौधरी साहब ने चौबीस घंटे किसान की चिंता की। उनके दरवाजे किसानों के लिए खुले रहते थे, इसकी बड़ी वजह यह थी कि वह किसान के घर जन्में और समस्याओं को बारीकी से जानते थे। राजनीति में किसानों के लिए आए थे और जिंदगी भर किसानों के ही होकर रहे। वर्तमान समय में किसान राजनीति सिर्फ शब्दों तक सिमट कर रह रही है, धरातल पर किसान राजनीति की स्थिति बेहद कमजोर दिखने लगी है।
सियासत में बढ़ते और चढ़ते चले गए चौधरी चरण सिंह
बागपत। बाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव में किसान मीर सिंह के परिवार में 23 दिसंबर 1902 में चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ। इसके बाद जनपद गाजियाबाद की तहसील मोदीनगर के गांव भदौला आ गए। जब वह छह साल के थे तो उनके पिता मेरठ के पास जानी खुर्द में आकर बस गए थे। आगरा विवि से लॉ की डिग्री लेकर गाजियाबाद में वकालत शुरू की, वह गरीबों से मुकदमे की फीस भी नहीं लेते थे। 1929 में गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। चौधरी चरण सिंह 1937 कांग्रेस के टिकट पर जनपद मेरठ की दक्षिण पश्चिम सीट से पहली बार संयुक्त प्रांत धारा सभा का चुनाव लड़े और चुनाव जीते भी । उन्होंने 1952 को उत्तर प्रदेश जमीदारी एवं भूमि सुधार अधिनियम बिल पास कराया। उन्होंने 1953 में उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम बिल पास कराया। उन्होंने किसानों के हित के लिए 1964 में किसान ट्रस्ट की स्थापना की। उन्होंने वर्ष 1964 में किसान हित में मंडी समिति बिल को विधानसभा में पारित कराया। वर्ष 1967 में कांग्रेस सरकार से खिन्न होकर वह विधान सभा में विरोधी बेंच पर जा बैठे और सरकार का प्रस्ताव बहुमत से गिर गया। तीन अप्रैल 1967 को वह सूबे के मुख्यमंत्री बनें, लेकिन 17 अप्रैल 1967 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। 1969 में यूपी के मध्यावधि चुनाव में चौधरी साहब की बीकेडी पार्टी को भारी सफलता मिली और 98 विधायक चुने गए। 17 फरवरी 1970 को वह फिर मुख्यमंत्री बने। 1977 में वह केंद्र में गृहमंत्री रहे, 1979 में वह उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री बने और इसके बाद वह देश के प्रधानमंत्री भी चुने गए।
चौधरी चरण सिंह ने मांगी थी पश्चिमी में हाईकोर्ट की बैंच
बागपत। वेस्ट यूपी में हाईकोर्ट बैंच का मुद्दा चौधरी चरण सिंह ने 37 साल पहले उठाया । उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसे वेस्ट यूपी के हक में बताया था। अधिवक्ता देवेंद्र आर्य एडवोकेट ने बताया कि वर्ष 1981 में बागपत के अधिवक्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल उनके दिल्ली स्थित आवास पर जाकर मिला और हाईकोर्ट बैंच के लिए समर्थन मांगा। इस पर बड़े चौधरी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर जनता की मांग न्यायोचित ठहराया था।