बड़ौत (बागपत)।
आधुनिकता की चकाचौंध ने भले ही सभी त्योहार को प्रभावित किया हो, लेकिन सदियों पुराना करवाचौथ का व्रत सुहागिन स्त्री अपने पति की दीर्घायु के लिए श्रद्धा और विश्वास के साथ करती है। बदलते दौर में पति भी अपने सफल दांपत्य जीवन के लिए इस व्रत का पालन करने लगे हैं।
मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में करवा चौथ के प्रति महिलाओं में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी है, ब्लकि इसमें और आकर्षण बढ़ा है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाले करवा चौथ त्योहार पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता, लेकिन आज यह दंपति के बीच सामंजस्य और रिश्ते की उष्मा से दमक और महक रहा है। आधुनिकता होता दौर भी इस परंपरा को डिगा नहीं सका है, ब्लकि इसमें अब ज्यादा संवेदनशील, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। रवि बालियान बताते है कि त्योहार की महत्ता न केवल महिलाओं के लिए पुरुष के लिए भी है। पति और पत्नी गृहस्थी रूपी रथ के दो पहिया है। किसी एक ने भी बिखरने से पूरी गृहस्थी टूट जाती है।
पिंकी रानी बताती है कि इस व्रत में चंद्रमा को छलनी में देखने का विधान इस बात की ओर इंगित करता है कि पति-पत्नी एक दूसरे के दोष की ओर इंगित करता है, पति पत्नी एक-दूसरे के दोष को छानकर सिर्फ गुणों को देखे। धीरज का कहना है कि करवाचौथ का त्योहार दंपति के मजबूत रिश्ते, प्यार और विश्वास का प्रतीक है। रेनू चौधरी बताती है कि करवा चौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, करवा यानी मिट्टी का बर्तन और चौथ यानी चतुर्थी। इस त्यौहार पर मिट्टी के बर्तन यानी करवा का विशेष महत्व मनाया। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा-अर्चना करने का विधान है। करवा चौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शांति, समृद्धि और संतान सुख मिलता है।