बागपत। राज्यसभा चुनाव में क्रास वोटिंग के कारण रालोद से निष्कासित विधायक सहेंद्र सिंह रमाला ने आखिरकार भाजपा का दामन थाम लिया है। रमाला के भाजपा में चले जाने से रालोद के गढ़ छपरौली में पहली बार कमल खिला है। भाजपा से उनकी नजदीकियां पहले भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय रही हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा से ही टिकट के बड़े दावेदार थे, लेकिन एन वक्त पर टिकट नहीं मिलने के कारण उन्होंने भाजपा छोड़ दी थी। कैराना उपचुनाव के लिए भी उनकी ज्वाइनिंग अहम मानी जा रही है।
पिछले माह 24 अप्रैल को राज्यसभा चुनाव में क्रास वोटिंग के चलते भाजपा को नौंवी सीट पर जीत हासिल हुई थी, जबकि बसपा का उम्मीदवार हार गया था। रालोद अध्यक्ष अजित सिंह ने छपरौली विधायक को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। तभी से यह कयास लगाए जा रहे थे कि सहेंद्र सिंह रमाला भाजपा का दामन थाम सकते हैं। इसके लिए सही वक्त का इंतजार किया गया। कैराना उपचुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा ने यही सही वक्त माना, इसकी एक वजह यह भी है कि छपरौली विधानसभा सीट कैराना लोकसभा के बराबर में पड़ती है। दोनों क्षेत्रों के गांव बराबर बराबर हैं। यही वजह है कि मतदाताओं को संदेश देने के लिए भाजपा ने सही वक्त का चुनाव किया।
जानिए, सहेंद्र सिंह रमाला को?
बागपत। रमाला गांव के रहने वाले सहेंद्र सिंह चौहान छपरौली से रालोद के पहली बार विधायक बने । इससे पहले वर्ष 2014 में वह भाजपा से लोकसभा चुनाव में बागपत सीट से टिकट के दावेदार थे। चंडीगढ़ में कारोबार करते हैं। हरियाणा के वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु रिश्ते में उनके समधी लगते हैं। कैप्टन अभिमन्यु के भाई वृतपाल सिंधू की बेटी की शादी पिछले वर्ष ही विधानसभा चुनाव से पहले उनके बेटे के साथ हुई थी।
सहेंद्र सिंह थे रालोद के अकेले विधायक
बागपत। पिछले विधानसभा चुनाव में सहेंद्र सिंह रमाला ही रालोद के अकेले विधायक चुने गए थे। छपरौली सीट से उन्होंने सपा के मनोज चौधरी को हराकर रालोद का खाता खोला था। अन्य सभी सीटों पर रालोद के उम्मीदवार पराजित हो गए थे। रमाला के भाजपा में चले जाने के बाद रालोद के हिस्से में कोई विधायक नहीं है।
सहेंद्र की चाल ने बिगाड़ दिए थे समीकरण
बागपत। राज्यसभा चुनाव में विधायक सहेंद्र सिंह रमाला के वोट से महा गठबंधन की तैयारी में जुटे रालोद को झटका लगा था। कैराना लोकसभा के उपचुनाव की तैयारी में जुटे रालोद ने विधायक पर कार्रवाई से महा गठबंधन के साथी सपा और बसपा को संतुष्ट करने की कोशिश की । असल में रालोद कैराना से जयंत चौधरी को चुनाव लड़ाने का दावा कर चुका था, लेकिन एन वक्त पर सहेंद्र सिंह के वोट से बसपा हार गई, इस कारण महा गठबंधन के लिए चल रही बातें कमजोर पड़ने लगी । यही वजह रही कि रालोद ने उन्हें निष्कासित किया ।