बागपत। नए दौर की भागमभाग में अंग्रेजी स्कूलों और बच्चों को अंग्रेजी सिखाने का चलन बढ़ रहा है। गली-गली खुल रहे पब्लिक स्कूल और रोजगार के क्षेत्र में बढ़ रहे अंग्रेजी के चलन से हिंदी की तरफ लोगों का रुझान कम हुआ है। अभिभावक खुद बच्चों के लिए अंग्रेजी अनिवार्य करते दिखते हैं, जबकि हिंदी अधिकतर क्षेत्र में सिर्फ बोलचाल की भाषा तक ही सिमटकर रह गई है। कुछ स्कूलों में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के बीच संवाद भी अंग्रेजी में अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे में विश्व हिंदी दिवसर पर शिक्षाविदों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार पर बल दिया है।
किरठल गांव के कवि और मैं द्रोणाचार्य बोलता हूं...जैसा कालजयी खंडकाव्य लिखने वाले बलवीर सिंह करुण कहते हैं कि वह अंग्रेजी का विरोध नहीं करते, लेकिन हिंदी को तो नहीं भूलना चाहिए। मातृभाषा का ज्ञान, लिपि की जानकारी बेहद जरूरी है। भाषा सिर्फ अंग्रेजी नहीं बल्कि पंजाबी, उर्दू सीखने में भी क्या बुराई हो सकती है। लेकिन दुनिया में हमारी पहचान हिंदी से है, इस वजह से अभिभावक और शिक्षक हिंदी का ज्ञान भी बच्चों को दें और हमेशा इसके लिए प्रेरित करें।
बड़ौत निवासी राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर पंकज बालियान कहते हैं कि रोजगार और नौकरी के क्षेत्र में अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि बच्चों को हिंदी से दूर कर दिया जाए। यह तो अभिभावकों और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं। मातृभाषा का ज्ञान जरूरी है। पब्लिक स्कूलों का चलन बढ़ने से बच्चों को अंग्रेजी सिखाने की होड़ मची हुई है।
पूर्व विधायक डा. अजय कुमार कहते हैं कि गांव दर गांव अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के खुलने से देहात तक में हिंदी के बजाए अंग्रेजी सीखने का चलन बढ़ गया है। शहरी क्षेत्र और मेट्रो सिटी में तो हिंदी बोलचाल की भाषा से भी गायब हो रही है। जबकि हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को इसका ज्ञान रखना जरूरी है।
श्री यमुना इंटर कॉलेज प्रधानाचार्य जयपाल शर्मा कहते हैं कि हिंदी का ज्ञान, प्रचार प्रसार जरूरी है। मातृभाषा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कोई भी भाषा इंसान सीखे, लेकिन मातृभाषा हमारी जड़ होती है। इसे कभी नहीं भूलना चाहिए।