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रटौल की खुशबू, जिस पर पाकिस्तान भी करता है अपना दावा

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चांदीनगर (बागपत)। आम की मिठास और खुशबू से दुनिया भर में रटौल गांव की पहचान है। अनवर रटौल आम की ऐसी प्रजाति है, जिसने दुनिया में धूम मचाई। यही नहीं पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान इस पर अपना दावा करता है। अनवर रटौल के नाम से डाक टिकट भी पाकिस्तान में जारी हो चुके हैं। बागपत के रटौल गांव में आम की खुशबू फैल रही है। आम के पेड़ फलों से लदे हुए हैं। चांदीनगर क्षेत्र का रटौल गांव अपने आम की किस्म अनवर रटौल से दुनिया भर में जाना जाता है। आम का साइज छोटा जरूर है, लेकिन मिठास और खुशबू ऐसी है कि भुलाए नहीं भूलती। रटौल क्षेत्र में आम की एक या दो नहीं बल्कि सैकड़ों प्रजातियां है। करीब एक हजार एकड़ जमीन पर यहां आम के बाग फैले हुए हैं। सभी प्रजातियों पर अनवर रटौल आज भी भारी है। इसके तोड़ की कोई दूसरी प्रजाति रटौल में इतना नाम हासिल नहीं कर सकी।
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1975 में फल पट्टी घोषित, लेकिन आज भी अनदेखी
चांदीनगर। रटौल गांव के लोग बताते हैं कि साल 1975 में रटौल क्षेत्र के आम की धमक को देखते हुए इस पूरे एरिया को मैंगों क्षेत्र घोषित किया गया था। तत्कालीन कृषि मंत्री चौधरी नरेंद्र सिंह ने आम की फसल को नुकसान देने वाली चीजों पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसके बाद धीरे-धीरे फिर से यह पूरा क्षेत्र अनदेखी का शिकार हो गया।


घटने लगी पैदावार, उद्यान विभाग की अदूरदर्शिता
चांदीनगर। किसान बताते हैं कि क्षेत्र में आम की पैदावार कम होने लगी है। उद्यान विभाग से उन्हें किसी तरह की सहायता नहीं मिली। सिर्फ रस्म अदायगी होती है। न तो बीमारियों से बचाव के विषय में बताया जाता और न ही दवा के छिड़काव के विषय में।
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बंटवारे में गए कुछ पेड़, पाकिस्तान ने ठोक दिया दावा
चांदीनगर। पूर्व सिंचाई मंत्री डॉ. मेहराजुद्दीन बताते हैं कि साल 1936-40 के आस पास रटौल निवासी मोहम्मद आफाक और हाजी बदरूदीन अनवर रटौल नाम की प्रजाति का पौधा लेकर पंजाब गए थे। जिस हिस्से में अनवर रटौल के पौधे लगाए गए तो वो बंटवारे के समय पंजाब का वह हिस्सा पाकिस्तान में चला गया। इसके बाद पाकिस्तान भी इस प्रजाति पर समय-समय पर दावा ठोकता रहता है। करीब दो साल पहले पाकिस्तान अनवर रटौल प्रजाति पर डाक टिकट जारी कर नए सिरे से दावा कर चुका है।

कभी उड़ती थी आम की दावत, अब नहीं रहे वह दिन
चांदीनगर। रटौल में एक दौर ऐसा भी गया, जब आम की दावत खाने के लिए देश के दिग्गज लोग आते थे, लेकिन धीरे-धीरे सब बीते जमाने की बात हो गई। पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, अभिनेता फारूख शेख, मध्य प्रदेश के राज्यपाल रहे बलराम जाखड़ समेत अन्य दिग्गज यहां आते रहे। इसके अलावा गांव से दिल्ली में प्रधानमंत्री को भी रटौल का आम भिजवाया जाता था। साल में एक बार यहां आम की दावत होती थी, लेकिन अब इसका चलन बंद हो गया है।

आम के शौक से जन्मीं अनवर रटौल किस्म
चांदीनगर। रटौल गांव के अनवर आम के शौकीन थे। वह बाग में नए-नए पेड़ लगाते और खुद भी आम की किस्म तैयार करते थे, लेकिन रटौल नाम से उन्होंने जिस प्रजाति को पैदा किया, उसे दुनिया में अनवर रटौल के नाम से जाना गया। बाद में उन्होंने अनवर रटौल के नाम से ही इसका पेटेंट भी कराया। पूर्व प्रधान जुनैद फरीदी कहते हैं कि दुनिया में आम की ऐसी कोई किस्म दूसरी पैदा नहीं हुई। यह उनके गांव और परिवार के लिए गौरव की बात है।

इन आमों की भी धूम
चांदीनगर। प्रदर्शनियों में शिरकत करने वाले रटौल के अबुल कलाम बताते हैं कि आम की रटौल किस्म का कोई जवाब नहीं है। इसके अलावा मकसूस, गुलाब जामुन, चौसा, लंगड़ा, सिरौली वाला, काला मालदा जौलाई वाला, दूधिया गोला, बेनजीर, रामकेला, दशहरी भी प्रदर्शनी में खूब चलती है।

एक हकीकत यह भी
चांदीनगर। ग्रामीण बताते हैं कि अनवर रटौल के दो बेटे थे। बड़े बेटे अबरार बंटवारे के दौरान पाकिस्तान चले गए और छोटे बेटे इसरार रटौल में ही रहे। इस तरह अबरार आम के पौधे लेकर भी पाकिस्तान गए थे, बाद में वहां पर उन्होंने पाकिस्तान में अनवर रटौल प्रजाति का पेटेंट करा लिया। रटौल में रहने वाले इसरार का परिवार वर्तमान समय में अलीगढ़ में रहता है। परिवार के कुछ लोग रटौल में भी रहते हैं।
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