जीवन की मुख्य खोज आनंद की प्राप्ति है - अरुण मुनि
बड़ौत। जैन स्थानक मंडी में धर्मसभा में जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि जीवन की मुख्य खोज आनंद की प्राप्ति है। इससे यह अनुभूति हो गई समझो उसके जीवन का विकास हो गया।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म के अनुसार कलह करना पाप होता है। हम उग्र तो हो जाते हैं मगर उग्र तम नहीं होते। उग्रतम होने की स्थिति में व्यक्ति उग्रवादी हो जाता है। मनुष्य के पारिवारिक रिश्तों से उसके सामाजिक रिश्तों का विश्लेषण किया जा सकता है। जो परिवार को ही नहीं संभाल पाया वह आत्मा को क्या संभालेगा। उन्होंने कहा कि शरीर, मन आत्मा और समाज को वहीं संभाल सकता है जो पारिवारिक संबंधों में परंपरागत हो। इनको समझाने वाला ही अध्यात्म की ऊंचाईयों को छू सकता है। समाज में परिवार में झगड़े का कारण न बनना भी बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। उन्होंने कहा कि आपका कल्याण तभी संभव हो सकता है जब आप अपने को शांत स्वभाव वाला बनाने में कुशल बन जाओगे। धर्मसभा में श्रीकृष्ण जैन, सुभाषचंद, कालू, राजीव जैन, अनिल जैन, वरदान, मनीष जैन, हंस कुमार जैन, दीपक जैन, शैलबाला, सविता, सीमा, रश्मि आदि उपस्थित थे।
कर्मों की निर्जरा वीतरागता के बल पर होगी - सुंदर सागर
बड़ौत। विहर्ष सभागार में धर्मसभा में सुंदर सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर के शासन में सबसे पहला उद्देश्य वीतरागता प्राप्त करने का दिया जाता है। इसको जो अपनायेगा वो वीतरागी संत जरूर बन जायेगा। कर्मों की निर्जरा वीतरागता के बल पर होगी। अगर भाग्य बदलना चाहते हो तो पुरुषार्थ करों। धर्मसभा में मदनलाल जैन, प्रमोद जैन, अशोक जैन, वरदान जैन, अतुल, संदीप, शशि, अखिलेश आदि उपस्थित थे।