क्रोध में व्यक्ति आपा खो देता है : अरुण मुनि
बड़ौत (बागपत)। जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि क्रोध करने वाला अपना आपा खो देता है। उसे ज्ञान नहीं रहता कि वह क्रोध में क्या कर रहा है।
जैन स्थानक शहर में हुई धर्मसभा में उन्होंने कहा कि क्रोध करने से व्यक्ति दूसरे का कुछ बिगाड़ पाता है या नहीं परंतु स्वयं का बिगाड़ ही लेता है। क्रोधित होकर मनुष्य पहले स्वयं व्याकुल होता है। बाद में वह व्याकुलता फैलती है। कुछ समय व्यक्ति अपना संताप को बाहर बिखेर देता है। इससे बाहर वाले भी व्याकुल हो जाते हैं। भूल से यदि किसी का हाथ अंगारों पर आ जाए तो वह जलने लगता है तथा उसे यह ज्ञान हो जाता है कि आग में हाथ नहीं देना चाहिए। मगर क्रोध करके बार-बार अपना नुकसान उठाकर भी व्यक्ति क्रोध को नहीं छोड़ पाता है।
उन्होंने कहा कि क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। जैसे दुश्मन को सामने से देखकर हर व्यक्ति संभल जाता है इसी प्रकार क्रोध रूपी दुश्मन से हमेशा सावधान रहें। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी विचार रखे। धर्मसभा में त्रिलोकचंद जैन, सुभाष जैन, रमेश जैन, अभय कुमार, दिनेश जैन, हंस कुमार जैन, दीपक जैन, कालू जैन, शैलबाला, इंद्राणी, सविता, मंजू आदि उपस्थित रहें।
भगवान महावीर का काल बहुत कठिन था : सुंदर सागर महाराज
बड़ौत। आचार्य सुंदर सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी का काल बहुत कठिन काल था। जबकि भगवान आदिनाथ का काल बहुत सरल था। उस समय श्रावक इतने भोलें थे कि जब गये क्षमा मांग ली। जब-जब केवल ज्ञान की प्राप्ति केवल ज्ञान को प्राप्त करेगें तो पूरा समवशरण लग जायेगा। धर्मसभा में मंगलाचरण डॉ. विकास जैन ने किया। सूर्यश सागर ने भी विचार रखे। धर्मसभा में मदनलाल, प्रमोद कुमार, अशोक, वरदान, संदीप, शशि, अतुल, अरिदमन, विनोद आदि उपस्थित रहें।