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एक वक्त की रोटी और दिनभर गालियां खाने के बाद मां के लिए कमाए दस रुपये

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बागपत में हाईवे स्थित टायर पंचर की दुकान - फोटो : BAGHPAT
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दिनभर की मजदूरी 10 रुपये, एक वक्त की रोटी और गालियां
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बाल कल्याण समिति ने टायर पंक्चर की दुकान पर काम करने वाले 12 साल के बालक को कराया रेस्क्यू
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत। कोरोना काल में पैदा हो रहे हालात ने लोगों को बेरोजगारी और बेबसी की ओर धकेल दिया है। भूख और मजबूरी बांह फैलाए खड़ी है। ऑनलाइन पढ़ाई धरातल तक पहुंची ही नहीं। कक्षा तीन में पढ़ने वाला 12 साल का छात्र टायर पंक्चर की दुकान पर काम करने को मजबूर है। इसके एवज में उसे मिलते हैं महज दस रुपये, एक वक्त की रोटी और गालियां।
बेबसी की यह तस्वीर है शहर के पुराना कस्बे की रहने वाली सलमा (परिवर्तित नाम) के घर की। शौहर साथ नहीं रहते। मायके में आसरा मिला। गरीबी से लड़ रही सलमा के चार बच्चे हैं। सबसे बड़ा 12 साल का सलीम (परिवर्तित नाम) कक्षा तीन का छात्र है। कोरोना संक्रमण काल में परिवार के सामने रोटी का संकट खड़ा हो गया, तो खेलने-कूदने की उम्र में सलीम बड़ौत रोड पर स्थित एक टायर पंक्चर की दुकान पर मजदूरी करने पहुंच गया। पुलिस की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, बाल कल्याण समिति और नवोदय लोक चेतना कल्याण समिति ने दुकान से मंगलवार को सलीम को रेस्क्यू किया।
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बाल कल्याण समिति के मजिस्ट्रेट राजीव यादव एवं सदस्य मालती शर्मा ने बताया कि काउंसिलिंग के दौरान छात्र ने परिवार की पीड़ा बयान की। उसने कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं। आठ दिन से वह काम कर रहा है। रोज उसे दस रुपये मिलते हैं, जो वह मां को जाकर दे देता है। दोपहर को तीन बजे दुकान पर खाना मिलता है। दुकान मालिक रोज ही गालीगलौज करता है। समिति अध्यक्ष ने बताया कि परिवार के सदस्यों को बुलाकर बच्चे को सौंप दिया है। परिवार की काउंसिलिंग की गई है। वहीं सलीम की मां ने कहा कि वह बच्चों को पढ़ाएगी और मजदूरी के लिए नहीं भेजेगी।
दो दिन में मुक्त कराए आठ बच्चे
पुलिस की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट प्रभारी एसआई धर्मेंद्र सिंह सिद्धू, बाल कल्याण समिति के मजिस्ट्रेट राजीव यादव और सदस्य मालती शर्मा ने बताया कि दो दिन में आठ बच्चों को बालश्रम करा रहे लोगों से मुक्त कराया गया है। भविष्य में भी यह अभियान चलता रहेगा।
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नहीं जानते क्या है ऑनलाइन पढ़ाई
कोरोना काल में एक तरफ बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई कराई जा रही है, दूसरी तरफ दो दिन में रेस्क्यू कराए गए बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के विषय में जानकारी तक नहीं है। इनके घरों में मोबाइल नहीं है।
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