मौसम वैज्ञानियों के अनुसार अगर इस बार अच्छी बारिश हुई तो बाढ़ की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। घाघरा की बाढ़ से हर वर्ष तबाही होती रही है। इस नदी के उफनाने पर पानी का दबाव महुला-गढ़वल बांध पर होता है, जिससे कटान होती है। गर्मी के मौसम ने नदी में पानी कम हुआ है लेकिन बंधे को कटान से बचाने के लिए उपाय नहीं किया गया। अगर जिला प्रशासन गंभीर नहीं हुआ तो बाढ़ आने की स्थिति में इस बार भी तबाही होगी।
बरसात के मौसम में जनपद के उत्तरी सीमा से होकर बहने वाली घाघरा नदी अपने विकराल रूप में होती है। नदी जब अपने रौद्र रूप में होती है तो उसका पूरा दबाव महुला-गढ़वल बांध पर होता है। बंधे को बचाने की चुनौती प्रशासन के सामने खड़ी हो जाती है। वहीं, गर्मी के मौसम में जब नदी का पानी अपनी पेटी में होता है तो बाढ़ खंड की ओर से बंधे को मजबूत करने की कोई कवायद नहीं की जाती है।
महुला-गढ़वल बांध पर हर वर्ष बरसात के मौसम में टूटने का खतरा मंडराता रहता है। तब विभाग द्वारा नदी में धड़ाधड़ बोल्डर डाले जाते हैं और बोरियों में बालू भरकर डाला जाता है लेकिन नदी की तेज धारा में वह विलीन हो जाता है। बताते चलें कि घाघरा जब अपने रौद्र रूप में होती है तो इसके किनारे बसे गांवों के लोगों को घरबार छोड़कर बंधे पर शरण लेनी पड़ती है। घाघरा के तांडव से अब तक पांच सौ लोग विस्थापित हो चुके हैं। लेकिन अभी भी लगभग 30 लोग ऐसे हैं जिन्हें आज भी प्रशासनिक मदद की दरकार है। घाघरा की धारा में 2004 से अब तक लगभग 600 घरों विलीन हो चुके हैं।
मिट्टी का स्टाक होना चाहिए। 25 हजार बोरी हमारे स्टाक में उपलब्ध है। रेगुलेटर की सफाई होनी है जो एक हफ्ते बाद होगी। जहां बंधा कमजोर है, वहां पर मिट्टी डाली जाएगी। 15 जून तक मानसून आता है उसके पहले बंधे की सुरक्षा के सारे इंतजाम कर दिए जाएंगे।
- ईश्वरचंद तिवारी, सहायक अधिशासी अभियंता