आजमगढ़। आरपीएफ व सीआईबी की संयुक्त टीम ने सोमवार को जनसेवा केंद्र पर छापेमारी की। इस दौरान टीम ने अवैध सॉफ्टवेयर से फर्जी आईडी पर तत्काल ई-टिकट बुक करने वाले दो एजेंटों को गिरफ्तार कर लिया। दोनों आरोपितों के पास से कुल 13 तत्काल ई-टिकट मिले, जिसकी कीमत करीब 6888 रुपये है। टिकट निकालने में प्रयुक्त उपकरण भी बरामद किए गए हैं।
आजमगढ़ के आरपीएफ थाना प्रभारी रमेश कुमार मीणा, औड़िहार आरपीएफ थाना प्रभारी नरेश कुमार मीणा व सीआईबी अरविंद कुमार यादव की संयुक्त टीम ने सोमवार को निजामाबाद बाजार में सुपर जन सेवा केंद्र पपर छापा मारा। इस दौरान जन सेवा केंद्र पर निजामाबाद थाना क्षेत्र के हुसैनाबाद गांव निवासी अनिल मौर्य व अरविंद कुमार मौर्य को धर दबोचा। टीम ने उनके पास से कुल 13 ई-टिकट बरामद किया। जिसकी कीमत 6888 रुपये है। सभी टिकटों पर यात्रा करना शेष है। आरपीएफ थाना प्रभारी रमेश कुमार मीणा दोनों आरोपी आईआरसीटीसी की साइट पर पर्सनल यूजर आईडी बनाकर अवैध तत्काल प्लस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रेल टिकट निकालते हैं। वह पिछले कई माह से अवैध ई-टिकट का काला कारोबार करते हैं। टीम में रेलवे सुरक्षा बल आजमगढ़ पोस्ट के सहायक उपनिरीक्षक बृजभूषण राय, कांस्टेबिल दुर्गा प्रसाद यादव, कांस्टेबिल अखिलेश सिंह, कांस्टेबिल अजय सोनकर, कांस्टेबिल विनय दुबे, रेलवे सुरक्षा बल पोस्ट औडिहार के कांस्टेबिल रामबहादुर तथा अपराध आसूचना वाराणसी के कांस्टेबिल सुमित कुमार खरवार शामिल थे।
सॉफ्टवेयर के जरिए चंद सेकेंड में टिकटों की हो जाती बुकिंग
रेलवे की तत्काल टिकटों को बनाने के लिए दलाल जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं, वह काफी एडवांस्ड है। इस सॉफ्टवेयर के जरिए कुछ ही मिनटों में कई टिकटें कंफर्म हो जाती हैं। दरअसल इस सॉफ्टवेयर में पैसेंजर्स से संबंधित सारी डिटेल्स पहले से ही लोड कर दी जाती है। इसके बाद इसे तत्काल टिकटों की बुकिंग शुरू होने के पहले सिस्टम पर फीड कर दिया जाता है। जैसे ही तत्काल टिकटों की बुकिंग शुरु होती है, कमांड देते ही सॉफ्टवेयर के जरिए टिकट की बुकिंग खुद-ब-खुद होने लगती है। इस तरह मिनटों में ही कई टिकटों की बुकिंग दलाल कर लेते हैं और पैसेंजर्स बिना टिकट के निराश होकर काउंटर से वापस लौट जाते हैं।
काउंटर पर टिकट बनाने में लग जाते एक से डेढ़ मिनट
आप अगर काउंटर से टिकट लेते हैं अथवा ई टिकट बनवाते हैं तो इसमें कम से कम एक से डेढ़ मिनट का वक्त लगता है। यह समय रेलवे के सिस्टम में नाम, पता, उम्र और जर्नी प्लेस को भरने में लग जाता है, जबकि दलाल जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं, उसमें पैसेंजर्स के सारे डिटेल्स पहले से फीड रहते हैं और कमांड देते ही एक के बाद एक टिकट की बुकिंग होने लगती है।