आजमगढ़। जिले पर लगा निरक्षरता का कलंक मिटाने के लिए सरकार ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई। इन योजनाओं पर करोड़ों रुपये भी खर्च किए गए, लेकिन अभी भी बहुत प्रयास की जरूरत है। इसके लिए जमीनी स्तर पर कार्य करने की जरूरत जताई जा रही है। विभागीय आंकड़ों के मुताबकि अभी तक जिले में कुल 18 लाख 41 हजार 996 लोग निरक्षर है।
निरक्षरता का कलंक मिटाने के लिए सरकार ने लाख प्रयास किए, लेकिन इस कलंक को मिटाने के लिए और प्रयास की आवश्यकता जताई जा रही है। जबकि सरकार द्वारा कई योजनाएं संचालित की गई। जिसमें गांव-गांव में जाकर लोगों को साक्षर बनाने के लिए प्रेरित किया जाना था। सर्वशिक्षा अभियान भी इसी का एक हिस्सा है। इन अभियानों पर लाखों रुपये खर्च भी किए गए लेकिन साक्षरता की बढ़ने की दर बहुत धीमी है। साक्षरता की संख्या जिले में 27 लाख 70 हजार 138 है। जबकि 18 लाख 41 हजार 996 लोग निरक्षर हैं। निरक्षरता की संख्या में सबसे अधिक संख्या महिलाओं की है।
जनपद में साक्षरता व निरक्षर की स्थिति
जिले की कुल जनसंख्या--- 4612134
पुरुषों की संख्या--- 2284157
महिलाओं की संख्या--- 2327977
जिले में निरीक्षर की कुल संख्या--- 1841996
पुरुषों की संख्या--- 725590
महिलाएं--- 1116406
जिले में कुल साक्षरता की संख्या--- 2770138
पुरुषों की संख्या--- 1558568
महिलाओं की संख्या--- 1211571
जिले में कुल साक्षरता की फीसद--- 70.92 फीसद
पुरुषों की फीसद--- 81.34
महिलाओं की फीसद--- 60.89
(आंकड़े 2011 की जनसंख्या के आधार पर)
अपना सब कुछ छोड़कर बच्चों को साक्षर बना रहे गिरिजेश
आजमगढ़। कहते हैं जहां चाह है वहीं राह है। कुछ इसी मंत्र को अपनाते हुए गिरिजेश तिवारी अपना सब कुछ छोड़कर निकल पड़े ज्ञान का उजियारा बांटने। रैदोपुर में किराए पर कमरा लेकर बच्चों को फ्री में पढ़ाकर उन्हें साक्षर बना रहे हैं। गरीबों में शिक्षा की लौ जला रहे हैं। सबके लिए उनका गुरुकुल खुला है। बच्चे में पढ़ने की ललक हो तो गरीबी को भी आड़े नहीं आने देते हैं। गिरिजेश तिवारी पुणे से मेडिकल की पढ़ाई छोड़ने के बाद जब लौटे तो उन्होंने शिक्षा की अलख जगाने की ठान ली। लोगों में निरक्षरता ने उन्हें ऐसा झकझोर दिया कि चिकित्सक बनने की मंशा उसी वक्त त्याग दिए। उनका कहना है कि जिद ने अगर हर बार ही इतिहास बनाया तो फिर से नया इतिहास बनाने की ही जिद है। हिम्मत व हौसले के साथ यदि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिल खुद कदमों में आ जाती है। इसी को उन्होंने अपना लक्ष्य बनाया है। वह किसी बच्चे से कुछ नहीं लेते और इधर-उधर से चंदा जुटा कर बच्चों पर खर्च करते हैं।