जिले के रंगमंच का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान उतना ही समृद्धिशाली और संभावनाओं से भरा है। तब और अब में एक बड़ा अंतर यह जरूर आया है कि तब संसाधनों का अभाव था आज का रंगमंच तकनीकी रूप से समृद्ध और प्रयोगवादी हुआ है।
जिले की साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रेरणा पुंज रहे कला भवन का रंगमंच यहां खेले गए हिन्दी, अंग्रेजी, पारसी और बंगला भाषा के नाटकों का गवाह रहा है। प्रदेश सरकार की पहल पर अब इसे तोड़कर दुबारा बनाया जा रहा है। इससे जिले का रंगमंच के बहुमुखी और समृद्ध होने की उम्मीद जगती है।
वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक प्रो. शशि भूषण ‘प्रशांत’ के मुताबिक 50 के दशक में जिले में साहित्यकारों का बड़ा समूह सक्रिय था। साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को और बढ़ावा देने के लिए एक मजबूत मंच की आवश्यकता महसूस की गई। तत्कालीन जिलाधिकारी कृपा नारायन श्रीवास्तव खुद साहित्यिक अभिरुचि के अधिकारी थे।
उन्हीं के प्रयास से वर्ष 1955 में कला भवन की नींव रखी गई। बाद में आए साहित्य प्रेमी जिलाधिकारी कटारा साहब ने कलाभवन में सुविधाएं बढ़वाईं। डीएम की पत्नी के नाम पर इस भवन में कुसुम संगीत महाविद्यालय और अयोध्या सिंह हरिऔध के नाम से पुस्तकालय की स्थापना भी हुई। यहीं से जिले की सांस्कृतिक विरासत को एक नया आयाम मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इसी दौर में छायाकार शंकर पांडेय के प्रयास से उस जमाने के महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और मुमताज अली का कलाभवन में आगमन हुआ। उन्होंने ही यहां के रंगमंच की आधारशिला रखी थी। उस जमाने में रंगमंच के प्रसिद्ध कलाकारों में निर्मोही जी, समशुल हुदा खान ‘डैडी’राजू राड्रिक्स आदि थे।
1975 में आधुनिक नाट्य कला का उदय हुआ, इस दौरान ओमप्रकाश पंाडेय, डा. शशिभूषण ‘प्रशांत’, समशुल हुदा खान ‘डैडी’ और अशोक राय ने मिलकर नवनाट्यम संस्थान की स्थापना की। 1976 में इस संस्थान ने पहला मंचन ‘हाथी घोड़ा चूहा’ ‘अंधायुग’ तथा अंतिम मंचन ‘परमात्मा का कुत्ता’ का किया।
1978 में आपसी मतभेद के बाद हुए बिखराव से एक नई संस्था समानांतर का गठन हुआ। इसमें बड़े नामचीन कलाकार अनिल भौमिक, राजेश सिंह, अशोक रंजन, अनिल रंजन भैमिक, भगवती अग्रवाल थे। बाद में यह संस्था स्थानांतरित होकर इलाहाबाद चली गई। इसके बाद रंगमंच पूरी तरह से ठप पड़ गया। 1998 में हरिकमल ने जिले की शिथिल पड़ी विरासत को सींचने का काम किया। इसका परिणाम है कि आज जिले का भरापूरा रंगमंच है। कई नाट्य संस्थाएं काम कर रही हैं।
सक्रिय हैं कई नाट्य संगठन ः इस वक्त जिले में संस्कार भारती, सूत्रधार, राष्ट्रीय साहित्य कला संस्थान, हुनर, समूहन, इप्टा, रामानंद सरस्वती पुस्तकालय जोकहरा और दृष्टि नाट्य संस्थान सक्रिय हैं। सूत्रधार और राष्ट्रीय साहित्य कला संस्थान हर वर्ष जिले में आरंगम् और रंगमहोत्सव जैसे कार्यक्रम कराते हैं।
1985 में रखी गई इप्टा की नींव ः रंगमंच के जरिए सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने के लिए जागरूक करने वाली इप्टा की नींव 1985 में पड़ी। मशहूर उर्दू शायर कैफी आज़मी इसके अध्यक्ष थे। संस्था के गठन का श्रेय लोकनिर्माण विभाग के इंजीनियर रहे शहजाद रिजवी को जाता है। इस संस्था ने जनजागरूकता के क्षेत्र में नुक्कड़ नाटक में अपनी अहम भूमिका अदा की। रंगमंच में तो कोई योगदान नहीं रहा।